Bihar politics : बिहार की राजनीति में इन दिनों जबरदस्त हलचल देखने को मिल रही है. NDA गठबंधन सरकार के भीतर सब कुछ ठीक-ठाक दिखने के बावजूद अंदरखाने सत्ता और उत्तराधिकार को लेकर खींचतान की चर्चा खूब हो रही है. रिपोर्ट की मानें तो एक तरफ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है, तो दूसरी ओर खुद नीतीश कुमार पर पार्टी को मजबुत करने और अपने बेटे निशांत कुमार को राजनीति में उतारने और उत्तराधिकारी घोषित करने का दबाव बढ़ता जा रहा है.
मीडिया रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि भाजपा गठबंधन धर्म निभाने की बात सार्वजनिक रूप से भले ही कर रही हो, लेकिन पार्टी के रणनीतिकार यह मानकर चल रहे हैं कि नीतीश कुमार की उम्र और बदले राजनीतिक हालात को देखते हुए अब बिहार में भाजपा का अपना मुख्यमंत्री होना चाहिए. यही वजह है कि कई मौके पर जद (यू) के भीतर भाजपा के बढ़ते दबाव को लेकर बेचैनी साफ दिखाई देने लगी है.
इस बीच प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के जनता दल (यूनाइटेड) में संभावित विलय को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं. बताया जा रहा है कि इस दिशा में अनौपचारिक स्तर पर प्रयास भी चल रहे हैं. कभी नीतीश कुमार के बेहद करीबी माने जाने वाले आरसीपी सिंह और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर दोनों ही एक बार फिर नीतीश के करीब आने की कोशिशों में जुटे हैं. हालांकि, केंद्रीय मंत्री और जद (यू) के प्रभावशाली नेता ललन सिंह इस राह में सबसे बड़ी अड़चन माने जा रहे हैं. हालांकि प्रशांत किशोर और प्रियंका गांधी के बीच दिल्ली में मुलाकात के बाद भी ऐसी सियासी अटकलें तेज हुई थी.
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि नीतीश कुमार के आसपास का एक खेमा यह मानता है कि अगर आरसीपी सिंह और प्रशांत किशोर की जद (यू) में वापसी होती है, तो इससे भाजपा का दबाव काफी हद तक कम किया जा सकता है. साथ ही पार्टी की राजनीतिक और वैचारिक पहचान भी फिर से मजबूत हो सकती है. यह खेमा मानता है कि संगठन और रणनीति दोनों मोर्चों पर जद (यू) को नई धार देने की जरूरत है.
इसी क्रम में एक और अहम प्रस्ताव पर भी चर्चा हो रही है. रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा कि कुछ नेताओं का सुझाव है कि राज्यसभा के उपसभापति पद पर हरिवंश की जगह संजय झा को आगे बढ़ाया जाए और निशांत कुमार को फिलहाल पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया जाए. इस फॉर्मूले के तहत मुख्यमंत्री पद पर नीतीश कुमार बने रहेंगे, जबकि निशांत कुमार को राज्यसभा भेजकर धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित किया जाएगा.
हालांकि निशांत कुमार को लेकर अंतिम फैसला अब तक नहीं हो पाया है. इसकी सबसे बड़ी वजह खुद नीतीश कुमार की सहमति न बन पाना बताया जा रहा है. नीतीश कुमार अपने राजनीतिक गुरु कर्पूरी ठाकुर के सिद्धांतों का हवाला देते हुए परिवारवाद के खिलाफ रुख रखते आए हैं. पार्टी के अंदर चर्चा है कि यही कारण है कि वे अपने बेटे को सीधे तौर पर तरजीह देने के पक्ष में नहीं हैं. लेकिन कभी सरकार द्वारा मुफ्त में दी जानें वाली सुविधाओं का विरोधी रहे नीतीश ने 2025 के विधानसभा में सत्ता में वापसी के लिए यह तरीका भी अपनाया.
बताया जाता है कि बसंत पंचमी के दिन ललन सिंह ने नीतीश कुमार को इस मुद्दे पर मनाने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन मुख्यमंत्री अब भी असमंजस में हैं. निशांत कुमार की संभावित एंट्री ने बिहार की राजनीति में परिवारवाद को लेकर एक नया विमर्श खड़ा कर दिया है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या नीतीश कुमार, जो लंबे समय से वंशवाद की राजनीति के विरोधी रहे हैं, बदलते राजनीतिक हालात में अपना रुख नरम करेंगे या फिर अपने सिद्धांतों पर कायम रहेंगे.
कुल मिलाकर, बिहार की सियासत में आने वाले दिनों में बड़े राजनीतिक फैसले और नए समीकरण सामने आ सकते हैं, जिनका असर न सिर्फ जद (यू) बल्कि पूरे राज्य की राजनीति पर पड़ेगा.