Bihar assembly elections 2025: कहते हैं कि राजनीति अपनी सुरक्षा को लेकर सबसे ज़्यादा चिंतित रहती है। सत्ता में रहने वाली पार्टी हो या विपक्ष, दोनों के सामने एक ही चुनौती रहता है कि वो तो जनता की सुरक्षा का दिखावा कर लेंगे लेकिन उन्हें सुरक्षित कौन रखेगा। अब अब राजनीतिक रूप से देखें और संवैधानिक नियमों का अनुसरण करें तो इन राजनेताओं का पहला कवच तो जनता होती है, जो वोट और जनसमर्थन से किसी भी नेता को ताकत देती है। लेकिन इसके अलावा राजनीति को चाहिए होता है असली सुरक्षा कवच,ऐसा सुरक्षा कवच, जो सत्ता के तर्क से नहीं, ताकत के तर्क से काम करता है।
इस दूसरे विकल्प की आकांक्षा रखने वाले नेता और उनकी पार्टी अपनी राजनीतिक संरक्षण में अपराधी पालते हैं जो लोकतंत्र का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और एक खतरनाक चेहरा है। अपनी सहूलियत के हिसाब से इन्हें कभी बाहुबली कहा जाता है, कभी दबंग तो कभी जनप्रिय और लोकप्रिय नेता का तमगा भी दिया जाता है। हालांकि इनका असली परिचय मैच इतना है कि यह सत्ता द्वारा पाला और पोसा गया महज एक अपराधी है। जो चुनाव के समय अपने चेहरे नेता या फिर आका के लिए शक्ति प्रदर्शन करते हैं, पैसे जुटाते हैं और उनका राजनीतिक हित साधते हैं। जिसके बदले में यह राजनेता और सत्ता इन अपराधियों को मदद करती है,यह मदद होता है अपराध में संरक्षण और जब सर पर किसी का हाथ हो खासकर सरकार का तो इन अपराधियों के सामने भारत का कानून भारत के प्रशासनिक व्यवस्थाएं और संवैधानिक संस्थाए कमजोर पड़ती चली जाती हैं। और जब ऐसे अपराधियों को लगता है कि उनकी ताकत कमज़ोर पड़ रही है या सत्ता का हाथ उनके सर से हट सकता है, तब वे कभी धमकाकर, कभी हिंसा करके अपने असली बाहुबली होने का प्रदर्शन करते है। दुखद यह है कि जिन लोगों को जेल में होना चाहिए, उन्हें टिकट दिया जाता है, मंच दिया जाता है और नेता का ताज पहना दिया जाता है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 इसका ताज़ा उदाहरण है। महागठबंधन लगातार नीतीश सरकार पर अपराध बढ़ाने का आरोप लगाता रहा है और एनडीए जंगलराज का भय दिखाता रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि दोनों ही गठबंधनों ने अपने-अपने खेमे से बाहुबलियों को टिकट दिए हैं। जातीय गणित और सत्ता के समीकरण में अपराधियों के लिए हमेशा जगह निकल ही आती है।
जहां चर्चा होनी चाहिए कि कौन उम्मीदवार विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन पर ईमानदारी से बात कर रहा है, वहां चर्चा यह है कि किस क्षेत्र से कौन सा बाहुबली मैदान में है। विकास पगडंडी पर है और मुद्दे हाशिये पर, जबकि अपराध और दबंगई चुनावी रणनीति का हिस्सा बने हुए हैं। चुनाव से पहले कई आपराधिक मामलों में आरोपियों को बाहर निकालना इसी खेल का हिस्सा है।
मोकामा में हुई हत्या इसकी भयावह मिसाल है,दोनों पक्षों ने पृष्ठभूमि पहले ही तैयार कर रखी थी। सीवान से लेकर मोकामा तक रिपोर्टें यही बताती हैं कि अपराध विरोध सिर्फ भाषणों में है। तेजस्वी यादव से लेकर नीतीश कुमार तक, अपराध पर नारे खूब लगे, पर हकीकत सबके सामने है। सलेक्टिव विरोध की राजनीति यहाँ बेनकाब हो चुकी है।
जो अपराधी राजनीति का हिस्सा हैं, वही सत्ता के सबसे नज़दीक बैठे दिखते हैं। सवाल उठता है कि क्यों आज हमारे राजनीतिक दलों में वह हिम्मत नहीं है कि बिना अपराधियों के चुनाव लड़ने की सोच सकें। जिसका साफ साफ संकेत है कि यह दौर लोकतंत्र का सबसे गहरा संकट है। आखिर अपराधियों से दूरी किसे है?