Bihar Exit Poll : बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान के बाद एग्जिट पोल्स की चर्चा जोरों पर है. तमाम चैनल और सर्वे एजेंसियां अपनी-अपनी गणनाओं के आधार पर नतीजों का अनुमान जारी कर रही हैं. लेकिन इतिहास गवाह है कि बिहार जैसे राज्य में एग्जिट पोल्स शायद ही कभी सटीक साबित हुए हों. चाहे 2015 का विधानसभा चुनाव हो या 2020 का, हर बार एग्जिट पोल्स सीटों के हिसाब से वास्तविक नतीजों से काफी दूर रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार की सामाजिक, भौगोलिक और राजनीतिक जटिलता के चलते यहां एग्जिट पोल्स की विश्वसनीयता कम हो जाती है. कुछ सर्वे एजेंसियां वोट प्रतिशत के अनुमान में करीब पहुंची हैं, लेकिन सीटों के हिसाब से भविष्यवाणी लगभग हर बार गलत साबित हुई है.
क्यों नहीं लग पाता एग्जिट पोल्स का सही अनुमान?
एग्जिट पोल्स का सही अनुमान नहीं लगा पाने के पीछे कई कारण है. इसमें मुख्य रूप से ये बड़े कारण है.
- माइग्रेंट वोटर्स का प्रभाव
बिहार से बाहर काम करने वाले लाखों प्रवासी मजदूर और कर्मचारी मतदान के बाद अपने कार्यस्थलों पर लौटने की जल्दी में रहते हैं. एग्जिट पोल के लिए जो सैंपल लिए जाते हैं, उनमें इन वोटर्स को शामिल करना मुश्किल होता है. यही कारण है कि बड़ी संख्या में ऐसे वोटर्स का रुझान पोल्स में दर्ज नहीं हो पाता.
- जाति-आधारित वोटिंग पैटर्न
बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों पर गहराई से टिकी हुई है. कई बार निचली या पिछड़ी जातियों के मतदाताओं का झुकाव अंतिम समय में बदल जाता है. चूंकि एग्जिट पोल्स में सैंपल साइज सीमित होता है, यह बदलाव पकड़ में नहीं आता और नतीजों की भविष्यवाणी गलत हो जाती है.
- साइलेंट वोटर्स की भूमिका
राज्य में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो मतदान से पहले या बाद में अपनी पसंद जाहिर नहीं करता. इन्हें “साइलेंट वोटर्स” कहा जाता है. सर्वे एजेंसियों के लिए इनकी राजनीतिक पसंद का अनुमान लगाना बेहद मुश्किल होता है. यही कारण है कि वास्तविक परिणाम अक्सर पोल्स से अलग होते हैं.
- महिला मतदाताओं का झुकाव
बिहार में पिछले कुछ चुनावों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से लगातार अधिक रहा है. 2020 के विधानसभा चुनाव में जहां पुरुषों का टर्नआउट 54.45% था, वहीं महिलाओं का टर्नआउट 59.69% तक पहुंच गया था. महिलाएं अपने मतदान के निर्णय को आमतौर पर साझा नहीं करतीं, जिससे सर्वे के आंकड़े असंतुलित हो जाते हैं.
एग्जिट पोल्स पर क्यों नहीं रहा भरोसा
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बिहार जैसे राज्यों में एग्जिट पोल्स को नतीजों की भविष्यवाणी के रूप में नहीं देखा जा सकता. बिहार के मतदाता बहुस्तरीय सामाजिक पहचान रखते हैं और जाति, धर्म, स्थानीयता और विकास के मुद्दों के बीच वह आख़िरी क्षण में निर्णय लेते हैं. इसके अलावा, ग्रामीण इलाकों में डेटा संग्रह की कठिनाई और प्रवासी मतदाताओं की अनुपलब्धता भी नतीजों की सटीकता घटाती है. इसलिए, जब तक असली मतगणना नहीं होती, बिहार के राजनीतिक समीकरणों को लेकर कोई भी एग्जिट पोल अंतिम सच नहीं माना जा सकता. वैसे भी देखें तो बिहार में एग्जिट पोल्स हर बार चर्चाओं में रहे हैं, लेकिन सटीकता के मामले में उनका रिकॉर्ड बहुत कमजोर रहा है. इस बार भी चुनावी माहौल में जब एग्जिट पोल्स के आंकड़े सामने आएंगे, तो मतदाताओं और विश्लेषकों दोनों की नज़र इस बात पर रहेगी कि क्या इस बार ये सर्वे इतिहास बदल पाएंगे या फिर एक बार फिर हकीकत से मीलों दूर साबित होंगे.