Tejashwi Yadav Politics: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए इस बार दो चरणों में बंपर मतदान हुए है. जिसके बाद अब सबकी नजर 14 नवंबर को आने वाले नतीजों पर है, लेकिन उससे पहले ज्यादातर एग्जिट पोल्स ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना जताई है। जबकि तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ रहे महागठबंधन (MGB) ने इन पोल्स को खारिज करते हुए दावा किया है कि जनता बदलाव के पक्ष में वोट कर चुकी है और सत्ता में परिवर्तन तय है. लेकिन सवाल उठता है कि अगर एग्जिट पोल्स सच साबित होते हैं और एनडीए सत्ता में लौट आता है, तो तेजस्वी यादव का राजनीतिक भविष्य का क्या होगा….
चलिए समझते है मौजूदा हालात अगर हकीकत में बदल जाता तो क्या हो कुछ हो सकता है… बिहार की सत्ता में वापसी की राह देख रही राजद और उसके सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने हालात को समझते हुए लंबा दांव खेला और फिर लालू ने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को अपना उत्तराधिकारी बनाया….तेजस्वी यादव ने पिता के बातों को मानते हुए राजनीति में कदम रखा और 2015 में उप मुख्यमंत्री के तौर पर बिहार के सत्ता को नजदीक से देखा लेकिन फिर 2017 में महागठबंधन टूटने के बाद वे विपक्ष में चले गए। 2020 के चुनाव में आरजेडी सबसे बड़ा दल बनकर उभरी, लेकिन सरकार नहीं बना सकी। 2022 में नीतीश कुमार के पाला बदलने से उन्हें दोबारा सत्ता का मौका मिला, जो ज्यादा दिन टिक नहीं पाया। ऐसे में अगर 2025 में भी आरजेडी सत्ता से दूर रहती है, तो तेजस्वी को लंबे समय तक विपक्ष में बैठना पड़ सकता है और राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, बिहार की बदलती सियासत में उनके लिए सर्वाइव करना मुश्किल होगा।
अगर तेजस्वी सत्ता से दूर रह गए तो तेजस्वी की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ विपक्ष में रहना नहीं, बल्कि परिवार के भीतर बढ़ती कलह से निपटना भी होगा. बड़े भाई तेज प्रताप यादव का बगावती रुख पार्टी और परिवार के अंदर गहरी दरार का संकेत दे रहा है। राबड़ी देवी ने भले दोनों बेटों को शुभकामनाएं दी हों, लेकिन लालू यादव द्वारा तेज प्रताप को पार्टी से बाहर करना इस संघर्ष को और बढ़ा गया है। इसके साथ लालू यादव के बेटियों की भी दोनों भाई को लेकर अलग अलग राय है. अगर यह विद्रोह गहराता गया तो ना सिर्फ परिवार बल्कि पार्टी में उनके खिलाफ बगावत हो सकती है और आरजेडी का पारंपरिक मुस्लिम-यादव वोट बैंक भी बिखर सकता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अगर तेजप्रताप, मीसा और रोहिणी साथ आ गए, तो यह तेजस्वी के लिए पार्टी में अस्तित्व का संकट बन जाएगा। बीजेपी और एनडीए के लिए यह रणनीतिक अवसर होगा और वो आरजेडी में विभाजन की स्थिति का राजनीतिक लाभ उठा सकते हैं।
अगर नतीजे एग्जिट पोल्स के मुताबिक आए और आरजेडी पिछड़ती दिखी, तो इसका असर पूरे महागठबंधन (MGB) पर पड़ना तय है। पहले से ही कांग्रेस और वाम दलों के बीच तालमेल की कमी दिखाई दी है। सीट शेयरिंग को लेकर लंबे विवादों के बाद तेजस्वी को महागठबंधन का मुख्यमंत्री चेहरा घोषित किया था। कई जगहों पर आरजेडी के उम्मीदवारों के खिलाफ प्रचार और संयुक्त पोस्टर्स से राहुल गांधी की तस्वीर गायब होने और एक ही सीट से गठबंधन के दो सदस्यों का मैदान में होने जैसी घटनाओं ने गठबंधन की एकता पर सवाल उठाए। ऐसे में अगर आरजेडी भी पीछे रहती है, तो महागठबंधन का पुनर्गठन मुश्किल होगा और छोटी पार्टियां, जैसे विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) जैसी सहयोगी, पाला बदलने का रास्ता तलाश सकती हैं।
अगर नतीजे एग्जिट पोल्स के मुताबिक आए, तो 14 नवंबर के बाद तेजस्वी यादव के सामने तीन बड़ी चुनौतियां होंगी , पारिवारिक विद्रोह को शांत करना, आरजेडी को एकजुट रखना और महागठबंधन को पुनर्गठित करना और जंगल राज की छवि से बाहर निकलकर बिहार के वोटरों का भरोसा दोबारा जीतना तेजस्वी के पास उम्र और समय दोनों हैं, लेकिन राजनीतिक वक्त तेजी से बदल रहा है। 2025 के नतीजे अगर एनडीए के पक्ष में गए, तो ते