120 bahadur film review : 120 बहादुर आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है. एक्सेल एंटरटेनमेंट और ट्रिगर हैप्पी स्टूडियोज के बैनर तले बनी यह वॉर-एपिक फिल्म साल की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल है. बॉक्स ऑफिस पर फिल्म को जबरदस्त प्रतिक्रिया मिल रही है, वहीं इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में बहस भी तेज हो गई है. फिल्म की कहानी 1962 के भारत-चीन युद्ध में लद्दाख के दुर्गम इलाके रेजांग ला में लड़ी गई ऐतिहासिक लड़ाई पर आधारित है, जहां भारतीय सेना की एक छोटी टुकड़ी ने चीनी सैनिकों का डटकर सामना किया था.
17 हजार फीट की ऊंचाई पर लड़ा गया था रेजांग ला का युद्ध
रेजांग ला की यह ऐतिहासिक भिड़ंत 17,000 फीट की ऊंचाई पर हुई थी. इस लड़ाई में भारतीय सेना की 13 कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी ने मोर्चा संभाला था. इस टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे मेजर शैतान सिंह भाटी. नवंबर 1962 की कड़कती ठंड में करीब 120–123 भारतीय सैनिकों की इस टुकड़ी ने लगभग 3,000 चीनी सैनिकों को कई घंटों तक आगे बढ़ने से रोके रखा. करीब पाँच घंटे तक चली इस भीषण लड़ाई में भारतीय सैनिकों ने अद्वितीय साहस और बलिदान का परिचय दिया.
इस लड़ाई में जीवित बचे जवान रामचंद्र यादव ने 2018 में एक इंटरव्यू में बताया था कि मेजर शैतान सिंह ने अपने जवानों से पीछे हटने का विकल्प रखा था. इस पर जवानों और जेसीओ ने एक स्वर में कहा था कि हम रेजांग ला को नहीं छोड़ेंगे. भगवान श्रीकृष्ण की हम पर कृपा है. इस पर मेजर ने जवाब दिया कि मैं भी तुम्हारे साथ हूँ. सरनेम भाटी है, लेकिन मैं भी यादव हूँ. यह संवाद आज भी भारतीय सैन्य इतिहास में साहस की मिसाल के रूप में याद किया जाता है.
नायब सूबेदार निहाल सिंह की आपबीती
इस युद्ध में जीवित बचे नायब सूबेदार निहाल सिंह ने 2012 में मीडिया को दिए इंटरव्यू में बताया था कि चीनी सैनिकों ने रात करीब 3:30 बजे अंधेरे का फायदा उठाकर अचानक हमला कर दिया था. भारी बमबारी के बीच चार्ली कंपनी लंबे समय तक मोर्चे पर डटी रही. जब चीनी पैदल सेना ने आगे बढ़ना शुरू किया तो निहाल सिंह ने अपनी लाइट मशीन गन से लगातार फायरिंग की. उन्होंने बताया था कि कुछ ही देर में पूरा इलाका शवों से भर गया था. निहाल सिंह, जो हरियाणा के रेवाड़ी जिले के चिमनावास गांव के रहने वाले हैं, उस दौरान बंकर में दो गोलियां लगने के बावजूद किसी तरह जान बचाकर बेस कैंप तक पहुंचे थे. इस अदम्य साहस के लिए उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया गया.
सेना के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, रेजांग ला की लड़ाई में 13 कुमाऊं रेजिमेंट के 109 सैनिक शहीद हुए थे. लेकिन रेवाड़ी में बने स्मारक पर 110 नाम दर्ज हैं. 110वां नाम सूबेदार मेजर हरि सिंह का है, जो युद्ध के बाद शहीदों के शवों को लाने वाले ऑपरेशन के प्रभारी थे और अंतिम संस्कार के कुछ मिनट बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा था. कुछ अन्य आंकड़ों में यह भी कहा जाता है कि इस लड़ाई में करीब 114 जवान शहीद हुए थे और कुल 120 सैनिकों ने हिस्सा लिया था.
मेजर शैतान सिंह को मिला परमवीर चक्र
रेजांग ला में अद्वितीय नेतृत्व और बलिदान के लिए मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत देश का सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया था. उनकी शहादत आज भी भारतीय सेना की शौर्य गाथाओं में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. वहीं 120 बहादुर को दर्शक देशभक्ति और सैन्य इतिहास की दृष्टि से काफी सराह रहे हैं. हालांकि, फिल्म की ऐतिहासिक प्रस्तुति, तथ्यों की व्याख्या और आज के भारत-चीन संबंधों से इसके सीधा जोड़े जाने को लेकर कई विवाद भी सामने आ रहे हैं.