…तो पुराने वादों पर ही खर्च होंगे 5.09 लाख करोड़, 11 मिनट 35 सेकेंड के बजट भाषण से मिलेगी बिहार के विकास को रफ्तार ?

बिहार के विकास को रफ्तार देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए अपने-अपने बजट की घोषणा कर दी है. संसद और बिहार विधानसभा में पेश लेखा-जोखा के मुताबिक, केंद्र सरकार ने बिहार के लिए 1.62 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, जबकि राज्य सरकार ने 3.47 लाख करोड़ रुपये का बजट तय किया है. इस तरह वित्तीय वर्ष 2026-27 में बिहार के विकास पर कुल 5.09 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाने का दावा किया गया है. सरकार का कहना है कि यह राशि बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, उद्योग और सामाजिक कल्याण योजनाओं के जरिए राज्य के समग्र विकास को गति देने के लिए खर्च की जाएगी. केंद्र और राज्य के साझा प्रयास से बिहार को तेज आर्थिक विकास और बेहतर जीवन स्तर की दिशा में आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है.

नई योजनाओं की कमी.. पुराने ऐलानों की पुनरावृत्ति

हालांकि बजट के आंकड़े भले ही बड़े हों, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी राशि खर्च कैसे और किन नई योजनाओं के तहत की जाएगी. बजट दस्तावेजों में किसी ठोस नए रोडमैप या बड़े संरचनात्मक सुधार की स्पष्ट घोषणा नजर नहीं आती. बजट में शामिल अधिकांश घोषणाएं पहले से घोषित योजनाओं से जुड़ी हैं, जिन पर काम या तो पहले से चल रहा है या जिनका ऐलान पहले ही किया जा चुका है. जानकारों के मुताबिक इनमें से कई घोषणाएं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले साल चुनाव से पहले अपनी प्रगति यात्रा के दौरान की थीं. कुछ घोषणाएं चुनावी प्रचार-प्रसार के दौरान प्रधानमंत्री ने की थी, जबकि बड़ी संख्या में फैसले सरकार बनने के बाद पहली कैबिनेट बैठक में घोषित किए जा चुके है. ऐसे में यह बजट नई दिशा तय करने के बजाय पुराने फैसलों की पुष्टि करता दिखता है.

शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि पर सबसे ज्यादा असर

इस बजट की सबसे बड़ी खासियत या कहें चिंता यह है कि सामाजिक विकास से जुड़े कई अहम विभागों के योजना मद में भारी कटौती की गई है. शिक्षा विभाग के योजना मद में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 4,400 करोड़ रुपये, यानी करीब 25 फीसदी तक की कटौती की गई है. जल संसाधन विभाग के योजना मद में लगभग 1,200 करोड़ रुपये कम किए गए हैं. कृषि विभाग और पीएचईडी (पेयजल एवं स्वच्छता विभाग) में से प्रत्येक के बजट में तकरीबन 250 करोड़ रुपये की कटौती की गई है. ग्रामीण रोजगार की रीढ़ माने जाने वाले मनरेगा (वीबी-जी राम जी) के बजट में भी 310 करोड़ रुपये की कटौती दर्ज की गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, जल और कृषि जैसे क्षेत्रों में योजना मद की कटौती का सीधा असर राज्य के मानव विकास सूचकांकों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.

बढ़ता गैर-योजना खर्च बना चुनौती

बजट पर नजर डालें तो एक और अहम पहलू सामने आता है, कि राज्य सरकार का गैर-योजना खर्च लगातार बढ़ रहा है. वेतन, पेंशन और कर्ज की अदायगी पर होने वाला खर्च अब बजट का बड़ा हिस्सा घेरने लगा है. इससे विकासात्मक योजनाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों पर दबाव बढ़ता दिख रहा है.

कुछ विभागों को मिली राहत

हालांकि बजट की पूरी तस्वीर नकारात्मक भी नहीं है. ग्रामीण विकास विभाग के योजना मद में लगभग 7,000 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी की गई है. माना जा रहा है कि इस अतिरिक्त राशि का उपयोग मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के अगले चरण में किया जाएगा. वहीं नगर विकास एवं आवास विभाग के बजट में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है. इस विभाग की योजना का आकार करीब डेढ़ गुना हो गया है और इसमें लगभग 3,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि जोड़ी गई है. कुल मिलाकर, बिहार के लिए 2026-27 का बजट आकार में बड़ा जरूर है, लेकिन इसकी दिशा और प्राथमिकताओं को लेकर सवाल भी कम नहीं हैं. जहां एक ओर सरकार विकास की बड़ी तस्वीर पेश कर रही है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और जल जैसे बुनियादी क्षेत्रों में कटौती ने बहस को जन्म दे दिया है. अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि घोषित बजट का क्रियान्वयन कितना प्रभावी होता है और इसका लाभ जमीनी स्तर तक कितनी तेजी से पहुंच पाता है.

शासन और विधायिका की भूमिका पर सवाल

केंद्र सरकार के बाद जब बिहार के अपनी सरकार ने बजट पेश किया तो बिहार के आम नागरिकों इससे कुछ खासा उम्मीदें थीं, लेकिन बिहार के वित्त मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने अपना बजट भाषण सिर्फ 11 मिनट 35 सेकेंड में निपटा दिया. जिसमें विकास की नई योजनाओं नदारद रही, पूरा बजट सरकार के आय-व्यय का हिसाब के अलावा कुछ और नहीं था.बजट को लेकर इस तरह की उदासीनता पर जानकार कहते हैं कि राज्य की शासकीय कार्यों में जरूरत से ज्यादा केंद्र की भूमिका और सत्ता के संतुलन के लिए बीच बीच में होने वाली योजनाओं की घोषणा के चलते बजट भाषण में आय-व्यय का हिसाब तो होता है मगर किसी प्रकार की नई घोषणा नहीं होती. जिसका नतीजा होता है कि आम लोगों के नजर में शासन और विधायिका महत्व एक कठपुतली जितना भर रह जाता है. जानकार यह भी दलील देते हैं की शासन के इस रवैये के कारण नुकसान आम जनता का होता है, जैसे कि पहले जब बजट पेश किया जाता था तो उसमें आय-व्यय का हिसाब रहता था,  विकास के योजनाओं की घोषणाएं होती थीं, सदन में उस पर बहस होती थी लेकिन अब जब शासन तंत्र का नया तरीका अपना रही है तो ना ही विकास के योजनाओं की घोषणाएं होती है और जब घोषणाएं ही नहीं होंगी तो  सदन में बहस किस बात पर होगी. नतीजा सत्ता अपनी मर्जी से जब जी चाहे, जो चाहे  फैसले ले रही है.

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इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र कहते हैं कि अब बजट बेमतलब हो रहे हैं. घोषणाएं अपनी मर्जी से पहले और बाद में होती रहती हैं. बजट में इन्हें बस शामिल कर लिया जाता है. उनका कहना है कि अगर सौ रुपये का बजट है तो इसमें 65 रुपये कामों में खर्च हो रहे हैं जो शासन को संतुलित करने का काम करती है, जबकि जनता की भलाई वाली योजनाओं में सरकार सिर्फ 35 रुपये खर्च करती है.

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