Bihar SIR Voter List : बिहार में 1 अगस्त को मतदाता सूची का प्रारूप जारी हुए 9 दिन बीत चुके हैं. यह वह समय है जब राजनीतिक दलों को अपने-अपने बूथ लेवल एजेंट (BLA) के जरिए नामों की सही-गलत जांच करनी चाहिए, त्रुटियों की शिकायत दर्ज करानी चाहिए, और उन मतदाताओं के लिए आवाज उठानी चाहिए जिनका नाम सूची से छूट सकता है. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, अब तक किसी भी दल ने एक भी औपचारिक आपत्ति दर्ज नहीं कराई है.
आखिर वजह क्या है?
राजनीतिक दलों की यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है. अगर विपक्ष वास्तव में मानता है कि बड़ी संख्या में लोगों को सूची से हटाया जा रहा है, तो उसे आधिकारिक रूप से आपत्ति दर्ज कराने में देरी क्यों? और सत्ता पक्ष क्यों चुप है? मतदाता सूची का यह चरण लोकतंत्र की नींव को सीधा प्रभावित करता है,इसलिए इसमें निष्क्रियता सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि राजनीतिक मंशा का भी संकेत हो सकती है.
चुनाव आयोग की अपील और दलों की चुप्पी
हालांकि चुनाव आयोग लगातार यह दोहरा रहा है कि कोई योग्य मतदाता छूटना नहीं चाहिए और कोई अयोग्य नाम जुड़ना नहीं चाहिए. इसके लिए मसौदा सूची में सुधार की प्रक्रिया भी खुली है. बावजूद इसके विपक्ष हो या सत्ता पक्ष दोनों तरफ़ से मौन साध लिया गया है. यह वही विपक्ष है जो हाल ही में एसआईआर प्रक्रिया का विरोध करते हुए मतदाताओं को अधिकार से वंचित करने के आरोप लगा रहा था.
क्यों खामोश हैं राजनीतिक पार्टियां
राजनीतिक चुप्पी के पीछे कई वजहें हो सकती हैं. दलों के बीएलए को सूची जांचने का काम मिला है, लेकिन शायद यह प्रक्रिया गंभीरता से नहीं चल रही. कभी-कभी दल सार्वजनिक विरोध तो करते हैं, लेकिन आधिकारिक शिकायत न करने का मतलब हो सकता है कि वे आगे इसे चुनावी मुद्दा बनाकर इस्तेमाल करना चाहते हों. यह भी संभव है कि दलों को लगता हो कि अंतिम सूची में बदलाव मुश्किल है, या फिर उनकी प्राथमिकता कहीं और है.
मतदान केंद्रों की संख्या में वृद्धि
इस बार बिहार ने प्रति बूथ मतदाताओं की संख्या 1,200 तक सीमित करने का निर्णय लिया है. इससे मतदान केंद्रों की संख्या 77,895 से बढ़कर 90,712 हो गई है. इसके साथ साथ बीएलओ की संख्या भी उतनी ही बढ़ गई है. 1 लाख स्वयंसेवक मतदाताओं की मदद करेंगे. ये बदलाव लंबी कतारों को खत्म करने की दिशा में अहम कदम हैं,लेकिन उन्हें सफल बनाने के लिए राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है.