Sabour University CAG Report : बिहार कृषि विश्वविद्यालय एक बार फिर विवादों के केंद्र में है. विश्वविद्यालय के कुलपति पर नियुक्तियों, वित्तीय अनियमितताओं और सरकारी निर्देशों की अनदेखी के आरोप लगे हैं. हाल ही में आई CAG (कैग) की व्यापक ऑडिट रिपोर्ट में कई गंभीर गड़बड़ियों का उल्लेख किया गया है, लेकिन अब तक किसी प्रकार की ठोस कार्रवाई नहीं होने से सवाल खड़े हो रहे हैं.
पांच साल का कार्यकाल और बढ़ते विवाद
बिहार के अधिकांश विश्वविद्यालयों में कुलपति का कार्यकाल तीन वर्षों का होता है, लेकिन कृषि विश्वविद्यालयों में यह अवधि पांच वर्षों की निर्धारित है. सवर कृषि विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति की नियुक्ति जनवरी 2023 में तत्कालीन राज्यपाल Phagu Chauhan के कार्यकाल में हुई थी. उनका कार्यकाल 2028 तक है. हालांकि, नियुक्ति के बाद से ही विश्वविद्यालय प्रशासन लगातार विवादों में बना हुआ है. विपक्षी दलों के साथ-साथ विधान परिषद और विधानसभा में भी कई बार इस विश्वविद्यालय में कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का मुद्दा उठ चुका है.
CAG रिपोर्ट में क्या-क्या आरोप?
कैग की रिपोर्ट में विश्वविद्यालय में हुई कई नियुक्तियों और वित्तीय प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए गए हैं. रिपोर्ट के अनुसार
- लगभग 300 असिस्टेंट प्रोफेसर एवं जूनियर साइंटिस्ट की नियुक्तियों में संभावित अनियमितता.
- प्रशाखा पदाधिकारी, सहायक, कुलसचिव और निदेशक स्तर की नियुक्तियों में धांधली के आरोप.
- ट्रांसफर-पोस्टिंग प्रक्रिया में गड़बड़ी.
- करीब 30 करोड़ रुपये की खरीद प्रक्रिया में अनियमितता की आशंका.
- लगभग 40 करोड़ रुपये के निर्माण कार्यों में वित्तीय गड़बड़ी की संभावना.
रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.
बिहार सरकार के आदेश की अनदेखी का आरोप
सबसे बड़ा आरोप यह है कि बिहार सरकार द्वारा नियुक्तियों पर लगाई गई रोक के बावजूद विश्वविद्यालय में चयन प्रक्रिया जारी रखी गई. बताया जा रहा है कि 2024 में राज्य सरकार ने नियुक्तियों पर रोक लगाई थी, जिसकी जानकारी 2025 में सार्वजनिक हुई. इसके बावजूद जून 2025 से फिर नियुक्तियां शुरू कर दी गईं. आरोप है कि चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र ईमेल के माध्यम से भेजे गए ताकि प्रक्रिया सार्वजनिक न हो सके. इसके अतिरिक्त राज्यपाल एवं कुलाधिपति Syed Ata Hasnain द्वारा कुलपतियों को नीतिगत निर्णय नहीं लेने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन निर्देशों की भी अनदेखी की.
विधान परिषद की जांच समिति सक्रिय
मामले की गंभीरता को देखते हुए बिहार विधान परिषद ने आठ सदस्यों की एक जांच समिति गठित की है. समिति विश्वविद्यालय में हुई नियुक्तियों और वित्तीय प्रक्रियाओं की जांच कर रही है. राजनीतिक गलियारों में भी यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है. कृषि विभाग से जुड़े होने के कारण विभागीय स्तर पर भी इस विश्वविद्यालय की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है.
शिक्षा व्यवस्था पर असर की आशंका
शिक्षाविदों का मानना है कि यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो इसका असर विश्वविद्यालय के शैक्षणिक माहौल और छात्रों के भविष्य पर पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को जल्द से जल्द स्वतंत्र जांच करानी चाहिए. यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए, और यदि आरोप निराधार हैं तो विश्वविद्यालय प्रशासन को सार्वजनिक रूप से क्लीन चिट दी जानी चाहिए. फिलहाल, सवाल यही है कि इतनी गंभीर रिपोर्ट और लगातार उठते आरोपों के बावजूद कार्रवाई कब होगी.
सोर्स : मीडिया रिपोर्ट