नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद बांकीपुर सीट से चुनाव लड़ने वाले दावेदारों की लंबी कतार, बीजेपी में इन नामों की चर्चा

Bihar politics : बिहार में 16 मार्च को हुए राज्यसभा के 5 सीटों पर चुनाव में NDA को बड़ी जीत हासिल हुई. इन पांच सीटों में दो भाजपा, दो जदयू और एक सीट उपेंद्र कुशवाहा के खाते में आई है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे नितिन नवीन भी राज्यसभा के लिए चुने गए हैं. जिसके बाद यह सीट आधिकारिक रूप से खाली हो गई है. अब संवैधानिक प्रावधानों के तहत छह महीने के भीतर यहां उपचुनाव होना तय है. स्थानीय राजनीतिक समीकरण को देखें तो यहां भाजपा मजबूत स्थिति में है. आंकड़े भी इसका समर्थन करते है. बीते 3 दशक से इस सीट पर नितिन नवीन परिवार का ही दवदवा रहा है. इसलिए भी यह कयास लगाया जा रहा कि यहां से भाजपा को उपचुनाव में कोई खास दिक्कत नहीं होने वाली. हालांकि उपचुनाव को लेकर बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. करीब 31 साल बाद इस सीट पर नितिन नवीन परिवार का सीधा जुड़ाव खत्म हो गया है.

दावेदारों की लंबी कतार

नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद बीजेपी के भीतर इस सीट को लेकर हलचल तेज हो गई है. कई बड़े नेता और उनके समर्थक टिकट की दावेदारी में जुट गए हैं. पार्टी के भीतर से लेकर बाहरी सहयोगियों तक, सभी अपनी-अपनी रणनीति बनाने में लगे हैं. बांकीपुर सीट के लिए बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया सह-प्रभारी संजय मयूख का नाम सबसे प्रमुख दावेदारों में माना जा रहा है. मयूख केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की कोर टीम के सदस्य बताए जाते हैं और संगठन में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है. 1990 में बीजेपी से जुड़ने वाले मयूख लंबे समय से संगठन में सक्रिय रहे हैं. 1995 में जब नितिन नवीन के पिता नवीन किशोर सिन्हा पहली बार इस सीट से विधायक बने थे, तब से ही मयूख क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं. वर्तमान में वे 2016 से विधान परिषद सदस्य हैं और जून 2026 में उनका कार्यकाल समाप्त हो रहा है.

अजय आलोक और रणवीर नंदन का नाम भी रेस में

बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया में सक्रिय चेहरा डॉ. अजय आलोक को भी बांकीपुर सीट का मजबूत दावेदार माना जा रहा है. वे पहले जदयू में प्रवक्ता और महासचिव रह चुके हैं और 2023 में बीजेपी में शामिल हुए थे. उनका राजनीतिक करियर 2003 में शुरू हुआ था और वे कैमूर की चैनपुर सीट से दो बार चुनाव लड़ चुके हैं, हालांकि दोनों बार हार का सामना करना पड़ा. पटना में उनकी सामाजिक और पारिवारिक पहचान भी मजबूत मानी जाती है. लिस्ट में धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष रणवीर नंदन का नाम भी इस सीट के संभावित उम्मीदवारों में शामिल है. वे पहले जदयू में नीतीश कुमार के करीबी माने जाते थे और 2014 में विधान परिषद सदस्य बने थे. 2020 में उन्हें दोबारा मौका नहीं मिला, जिसके बाद उन्होंने 2023 में जदयू छोड़ दी. उनकी साफ-सुथरी छवि और शिक्षित व्यक्तित्व को उनकी ताकत माना जा रहा है.

नई पीढ़ी भी मैदान में

बांकीपुर सीट के लिए कुछ नए चेहरे भी सक्रिय हो गए हैं. कुम्हरार के पूर्व विधायक अरुण सिन्हा के बेटे आशीष सिन्हा टिकट की दौड़ में शामिल हैं. वे पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं और युवा नेतृत्व के तौर पर अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं.

कायस्थ वोट बैंक का असर

पटना के शहरी क्षेत्रों में कायस्थ मतदाताओं का प्रभाव निर्णायक माना जाता है. बांकीपुर में इनकी आबादी 13 प्रतिशत से अधिक बताई जाती है. यही कारण है कि बीजेपी इस सीट पर उम्मीदवार चयन में जातीय संतुलन को लेकर सतर्क है. पटना साहिब लोकसभा सीट पर भी लंबे समय से कायस्थ नेताओं का वर्चस्व रहा है. पहले शत्रुघ्न सिन्हा और वर्तमान में रविशंकर प्रसाद यहां से सांसद हैं. उधर बीजेपी ने हाल ही में हुए विधानसभा कुम्हरार सीट पर कायस्थ उम्मीदवार की जगह अन्य जाति को मौका देकर प्रयोग किया था, हालांकि चुनाव जीतने के बावजूद पार्टी को विरोध का सामना करना पड़ा था. ऐसे में बांकीपुर सीट पर उम्मीदवार चयन पार्टी के लिए एक अहम राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा है, जहां संगठन, जातीय समीकरण और स्थानीय प्रभाव तीनों को संतुलित करना होगा.

सोर्स : मीडिया रिपोर्ट

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *