एक बार नियम तो दोबारा मंत्री क्यों बन गए दीपक प्रकाश ? RLM नेता के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर

Deepak Prakash : बिहार विधान परिषद के 10 सीटों के लिए होने वाले चुनाव के लिए सोमवार ( 8 जून ) आखिरी दिन है. विधानसभा के मौजूदा गणित के अनुसार दस सीटों में नौ सीटों पर एनडीए और एक सीट महागठबंधन के खाते में जानी पक्की है. समीकरण को देखते हुए एनडीए ने अपने सभी नौ उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. लेकिन इन नौ उम्मीदवारों में बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का नाम नहीं है. जिस कारण से उनके मंत्री पद पर बने रहने पर संशय लग रहा है. इस बीच जानकारी ये भी है कि उनके दोबारा मंत्री बनने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है.

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर क्यों

दरअसल, बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की दोबारा नियुक्ति को लेकर संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है. उनकी नियुक्ति को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई है, जिसमें दावा किया गया है कि वे राज्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं, इसलिए मंत्री पद पर बने रहना संविधान के प्रावधानों के विपरीत है. याचिका में संविधान के अनुच्छेद 164(4) का हवाला देते हुए कहा गया है कि कोई गैर-विधायक अधिकतम छह महीने तक मंत्री रह सकता है, लेकिन इस अवधि के भीतर उसे राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य बनना अनिवार्य है. याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह प्रावधान एक बार मिलने वाली संवैधानिक छूट है, जिसे सरकार बदलने या पुनर्नियुक्ति के जरिए दोबारा लागू नहीं किया जा सकता.

दो नियुक्तियों के बीच बना विवाद

जानकारी के लिए बता दें कि दीपक प्रकाश को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 20 नवंबर 2025 को मंत्री बनाया था, जबकि वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे. बाद में 15 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार सरकार के गिरने के साथ मंत्रिपरिषद भंग हो गई. इसके 22 दिन बाद 7 मई 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनी नई सरकार में दीपक प्रकाश को फिर से मंत्री पद की शपथ दिलाई गई. याचिकाकर्ता का कहना है कि पहली नियुक्ति से छह महीने की संवैधानिक अवधि 20 मई 2026 को समाप्त हो चुकी थी. ऐसे में पुनर्नियुक्ति के जरिए इस अवधि को बढ़ाना संविधान की भावना के विपरीत है.

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले S.R. Chaudhuri v. State of Punjab का उल्लेख किया गया है. इस फैसले में अदालत ने कहा था कि अनुच्छेद 164(4) के तहत मिली छह महीने की छूट को बार-बार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि मुख्यमंत्री बदलने, मंत्रिमंडल के पुनर्गठन, इस्तीफे या नई सरकार के गठन के आधार पर इस अवधि को रीसेट नहीं किया जा सकता. ऐसा करना संवैधानिक प्रावधानों को दरकिनार करने जैसा होगा.

लोकतांत्रिक व्यवस्था पर असर का तर्क

याचिका में यह भी कहा गया है कि बिना चुने गए व्यक्तियों को बार-बार मंत्री पद पर नियुक्त करने की अनुमति देने से संसदीय लोकतंत्र, प्रतिनिधिक शासन, सामूहिक जिम्मेदारी और चुनावी जवाबदेही जैसे मूल संवैधानिक सिद्धांत कमजोर पड़ेंगे. सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि वह दीपक प्रकाश से यह स्पष्ट करने को कहे कि वे किस संवैधानिक अधिकार के तहत मंत्री पद पर बने हुए हैं तथा उनकी पुनर्नियुक्ति को असंवैधानिक और शून्य घोषित करे.

विधान परिषद चुनाव में टिकट नहीं मिलने से बढ़ी मुश्किल

इस बीच राजनीतिक स्तर पर भी दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर बने रहने को लेकर सवाल उठने लगे हैं. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने बिहार विधान परिषद की 10 सीटों पर होने वाले चुनाव के लिए अपने सभी नौ उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है, लेकिन दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया गया. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि उन्हें किसी सदन की सदस्यता नहीं मिलती है तो मंत्री पद बचाना मुश्किल हो जाएगा. संवैधानिक प्रावधानों के तहत 7 नवंबर 2026 तक उन्हें विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना आवश्यक होगा.

फिलहाल नहीं दिख रहा कोई रास्ता

वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में दीपक प्रकाश के लिए किसी सदन की सदस्यता हासिल करने के विकल्प सीमित नजर आ रहे हैं. निकट भविष्य में विधान परिषद की कोई नई सीट रिक्त होने की संभावना नहीं है. राज्यपाल मनोनीत कोटे की रिक्तियों पर भी चुनाव अगले वर्ष प्रस्तावित हैं. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका और राजनीतिक परिस्थितियों के बीच बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का मंत्री पद संकट में दिख रहा है.