सूखा नशा और बढ़ता अपराध…बिहार में ड्रग्स जाल में फंसती युवा पीढ़ी, हैरान करने वाला है आंकड़ा

Drug cases in bihar : बिहार में हाल के दिनों में सामने आई अपराध की घटनाओं में एक खास पैटर्न देखने को मिला हैं. यह पैटर्न है शराबबंदी वाले बिहार में सूखा नशा की लत. विशेषज्ञों और नशा मुक्ति केंद्र संचालकों का मानना है कि बिहार में शराबबंदी के बाद युवाओं का एक बड़ा वर्ग गांजा, स्मैक, कोरेक्स, नशीले इंजेक्शन और टैबलेट जैसे सूखे नशे की ओर मुड़ गया है. हालांकि सरकार इसको सीधे स्वीकार नहीं करती, लेकिन बढ़ती बरामदगी और अपराध के आंकड़े सरकार के दावों को सवालों के कटघरे में ला खड़ी करती हैं.

नशा मुक्ति केंद्रों में बढ़ी भीड़

मीडिया रिपोर्ट की मानें तो राज्य के ज्यादातर नशा मुक्ति केंद्र में पहले शराब के मरीज ज्यादा आते थे, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. शराबबंदी के बाद से नशा मुक्ति केंद्र में आने वाले मरीजों में ज्यादा गांजा और स्मैक के मरीज होते हैं.इसके साथ साथ कोरेक्स, इंजेक्शन, स्मैक और टैबलेट लेने वाले युवाओं की संख्या भी कम नहीं है. इतना ही नहीं राज्य में नशा मुक्ति केंद्र की संख्या में भी बढ़ोतरी देखने को मिला हैं. 2016 तक बिहार में मुश्किल से 13-14 नशा मुक्ति केंद्र थे, जबकि अब सिर्फ पटना में ही 20 से अधिक केंद्र संचालित हो रहे हैं. सरकारी और निजी संस्थानों को मिलाकर राज्य में लगभग 200 नशा मुक्ति केंद्र होने का अनुमान है.

नशीले पदार्थों की बरामदगी में भारी वृद्धि

राज्य में नशीले पदार्थों की बरामदगी के आंकड़े भी इस बदलते पैटर्न की पुष्टि करते हैं. 2015 में बिहार में 14.37 किलो गांजा,1.12 किलो हेरोइन,1.97 किलो अफीम बरामद हुआ था. वहीं 2025 में यह आंकड़ा लगभग 28,000 किलो गांजा, 2,400 किलो अफीम और पॉपी स्ट्रॉ, 3.25 लाख कोडीनयुक्त कफ सिरप की बोतलें और 3.48 लाख नशीली टैबलेट तक जब्त की गईं. लगभग एक साल पहले पटना में अप्रैल 2025 में एक गोदाम से करोड़ों रुपये के नशीले इंजेक्शन और कफ सिरप बरामद होने की घटना ने इस नेटवर्क की व्यापकता को उजागर किया. विशेषज्ञों का मानना है कि जब्ती के ये आंकड़े केवल संकेत हैं, क्योंकि वास्तविक खपत इससे कहीं अधिक हो सकती है.

विशेषज्ञों की चेतावनी

विशेषज्ञों का मानना है कि नशे की प्रवृत्ति पूरी तरह खत्म नहीं की जा सकती. लोग किसी न किसी नशे के आदी होते ही हैं. यदि एक नशे पर रोक लगाई जाती है तो वे दूसरे विकल्प तलाशते हैं. यही एक कारण है कि शराबबंदी के बाद कई युवा गांजा और अन्य खतरनाक ड्रग्स की तरफ शिफ्ट हुए हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि सूखा नशा शराब से कहीं अधिक खतरनाक है. ड्रग्स शरीर, समाज और आर्थिक स्थिति तीनों को बहुत तेजी से बर्बाद करता है. एक ड्रग एडिक्ट का रोज का खर्च डेढ़ से दो हजार रुपये तक होता है. पैसे की कमी होने पर वह या तो अपराध की ओर जाता है या फिर ड्रग पेडलर बन जाता है.

ड्रग्स के खिलाफ कार्रवाई कर रही सरकार

सरकार का कहना है कि वह ड्रग्स के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही है. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने विधानसभा में बताया कि 2025 में 2,161 मामले दर्ज किए गए, 3,520 लोगों को गिरफ्तार किया गया और सीमावर्ती क्षेत्रों में विशेष निगरानी बढ़ाई गई. राज्य में सितंबर 2025 में स्टेट नारकोटिक्स ब्यूरो का गठन भी किया गया, हालांकि विशेषज्ञों का दावा है कि यह संस्था अभी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रही है.

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