वक्फ बिल पर नीतीश की चुप्पी और मुस्लिम नाराज़गी, क्या बिहार में जूनियर पार्टनर बनकर रह जाएंगे नीतीश ?

Nitish Kumar on Waqf Bill : वक्फ संशोधन बिल पर समर्थन के बाद से देश भर के मुसलमानों में असंतोष की लहर है. उन्हें यह आशंका सता रही है कि इस संशोधन से वक्फ बोर्ड की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी और सरकार इसकी संपत्ति पर नियंत्रण जमा लेगी. संसद में भले ही सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा हो कि यह संशोधन अवैध कब्जों को हटाने और वक्फ संपत्ति के बेहतर प्रबंधन में सहायक सिद्ध होगा, लेकिन सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी मुस्लिम समुदाय का गुस्सा कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है.

बिहार की कहानी इस पूरे घटनाक्रम में एक अलग ही मोड़ लेती है. यहाँ की मुस्लिम आबादी को न सिर्फ बिल के पारित होने से ठेस पहुंची है, बल्कि उन्हें इस बात का भी गहरा अफसोस है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जिन पर वे लंबे समय से भरोसा करते आए हैं ,ने इस मामले में उनका साथ नहीं दिया.

 Waqf Bill पर नीतीश से टूटा भरोसा?

बिहार के मुसलमानों ने दशकों तक कांग्रेस, फिर लालू यादव की आरजेडी पर भरोसा किया, लेकिन एक समय ऐसा आया जब नीतीश कुमार ने अपने विकासोन्मुखी और समावेशी राजनीति से उनका विश्वास जीता. खासकर पसमांदा मुसलमानों के लिए बनाई गई योजनाएं और बिना भेदभाव के विकास ने उन्हें जेडीयू की ओर आकर्षित किया. लेकिन वक्फ बिल पर जेडीयू का समर्थन मुस्लिम समाज को नागवार गुज़रा है. उनकी प्रतिक्रिया साफ है , इफ्तार पार्टी का बहिष्कार, जेडीयू के मुस्लिम नेताओं के इस्तीफे, और सड़कों पर आक्रोश. यह महज़ नाराज़गी नहीं, बल्कि विश्वास के टूटने की टीस है.

 Waqf Bill पर नीतीश की चुप्पी और बदलता राजनीतिक मिज़ाज

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार ने सच में मुसलमानों की आवाज़ को अनसुना किया या उन्हें इससे जुड़ी सच्ची तस्वीर ही नहीं दिखाई गई? क्या अब वे उस दौर में हैं जहाँ राजनीतिक निर्णय उनकी अंतरात्मा से कम, रणनीतिक गणनाओं पर अधिक आधारित हैं? नीतीश की चुप्पी इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल बन गई है. आम तौर पर त्वरित प्रतिक्रियाएं देने वाले मुख्यमंत्री इस बार एकदम खामोश हैं. क्या यह वही नीतीश हैं जो कभी मनन-चिंतन के बाद चौंकाने वाले राजनीतिक फैसले लेने के लिए मशहूर थे? क्या अब उनके फैसलों का केंद्र ‘बहुसंख्यक हित’ हो गया है?

मुस्लिम गोलबंदी बनाम हिंदू ध्रुवीकरण

राजनीति में कोई भी प्रतिक्रिया एकतरफा नहीं होती. मुस्लिम समाज के भीतर बढ़ती गोलबंदी के साथ-साथ बिहार में हिंदू मतों का ध्रुवीकरण भी देखा जा सकता है. योगी आदित्यनाथ और पीएम मोदी जैसे नेताओं की भाषणशैली और नारेबाज़ी से उत्पन्न माहौल को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर वक्फ मुद्दे पर मुसलमान एकजुट होते हैं, तो हिंदू मतदाता भी संगठित हो सकते हैं. ऐसे परिदृश्य में जेडीयू को भले ही मुस्लिम वोटों का नुकसान उठाना पड़े, लेकिन यदि भाजपा के कोर वोटर नीतीश को स्वीकार कर लें, तो यह ‘नफा-नुकसान’ की गणित उनके पक्ष में पलट सकती है.

राजनीतिक समीकरणों की उलझन

बिहार में मुसलमानों की आबादी करीब 17.7 प्रतिशत है, जो किसी भी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकती है. हालांकि, इतिहास गवाह है कि यह वोट बैंक हमेशा एकजुट नहीं रहा. आरजेडी का एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण इस वर्ग को साधने की कोशिश करता रहा, पर 2020 के चुनाव में इसके बावजूद आरजेडी को सिर्फ 23 प्रतिशत वोट ही मिले. ऐसे में सवाल उठता है, क्या मुस्लिम वोट आरजेडी, AIMIM और प्रशांत किशोर की जन सुराज के बीच बंट जाएंगे? या फिर कोई नया सियासी मसीहा उभरेगा जो इस असंतोष को सही दिशा दे?

क्या यह नीतीश का रणनीतिक ‘कैलकुलेशन’ है?

नीतीश कुमार कोई भी फैसला (Nitish Kumar on Waqf Bill) बिना राजनीतिक लाभ-हानि की गणना किए नहीं लेते. हो सकता है कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय के ‘मामूली वोट बैंक’ को त्यागने का फैसला सोच-समझ कर लिया हो. शायद उन्हें लग रहा है कि अब बहुसंख्यक समर्थन ही उन्हें सत्ता में बनाए रखने का एकमात्र रास्ता है. वक्फ बिल के समर्थन ने यह तो साफ कर ही दिया है कि अब नीतीश कुमार की राजनीतिक प्राथमिकताएं बदल रही हैं. यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि एक सुविचारित रणनीति का हिस्सा लगता है. मुस्लिम समाज अब सवाल पूछ रहा है, कौन है हमारा नया सियासी रहनुमा? नीतीश की चुप्पी ने इस प्रश्न को और तीखा बना दिया है. अब देखना होगा कि क्या लालू की विरासत फिर से मुसलमानों को अपनी ओर खींच पाएगी, या कोई नया चेहरा उभरेगा जो इस समुदाय की उम्मीदों का नया केंद्र बनेगा. बिहार की सियासत एक दिलचस्प मोड़ पर है. वक्फ बिल के बाद उभरे हालात ने नीतीश कुमार को एक बार फिर सुर्खियों में ला खड़ा किया है.

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