Supreme Court SIR Hearing : बिहार चुनाव से पहले चुनाव आयोग द्वारा कराए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया को लेकर दायर याचिकाओं पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग को राहत दी है.
सुप्रिम कोर्ट ने क्या कहा
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि SIR प्रक्रिया पूरी तरह वैध, संवैधानिक और कानून के अनुरूप है. अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत इस तरह की प्रक्रिया चला सकता है और बिहार में हुए इस प्रक्रिया में किसी प्रकार की कानूनी खामी नहीं पाई गई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग की शक्तियां संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उससे जुड़े नियमों के तहत सुरक्षित हैं. अदालत ने यह भी माना कि मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है और SIR उसी दिशा में उठाया गया कदम है.
क्या था मामला?
दरअसल बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले हुए SIR प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई थीं. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि चुनाव आयोग को इतने बड़े स्तर पर विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कराने का अधिकार नहीं है. उनका तर्क था कि यह प्रक्रिया नागरिकता की जांच के नाम पर मतदाताओं के अधिकारों का उल्लंघन कर सकती है. इस मामले में Association for Democratic Reforms (ADR), People’s Union for Civil Liberties (PUCL) समेत कई संगठनों के अलावा विपक्षी नेता Manoj Jha, Mahua Moitra, K. C. Venugopal, Pappu Yadav और Sudhakar Singh ने याचिका दायर की थी.
कोर्ट में क्या हुआ
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि SIR प्रक्रिया में नियमों और प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन किया गया. मतदाता सूची से नाम हटाने से पहले लोगों को नोटिस दिया गया और अपनी बात रखने का अवसर भी प्रदान किया गया. कोर्ट ने कहा कि प्रक्रिया के लिए कौन-कौन से दस्तावेज मान्य होंगे, यह तय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास है. कोर्ट ने यह भी कहा कि आधार कार्ड को दस्तावेजों की सूची में शामिल करने का फैसला बतता है कि यह मनमाना नहीं था. हालांकि अदालत ने कहा कि SIR का उद्देश्य नागरिकता तय करना नहीं, बल्कि केवल यह जांचना है कि कोई व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल होने के योग्य है या नहीं.
नागरिकता पर सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता तय नहीं कर सकता. अदालत ने कहा कि आयोग केवल मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने के सीमित संदर्भ में पात्रता की जांच कर सकता है. कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम गैर-नागरिक होने के संदेह में हटाए गए हैं, उनके मामलों को चार सप्ताह के भीतर गृह मंत्रालय और विदेशी न्यायाधिकरण जैसी सक्षम एजेंसियों को भेजा जाए, ताकि नागरिकता पर अंतिम फैसला वही संस्थाएं करें.
अनुपातिकता के सिद्धांत पर खरी उतरी SIR प्रक्रिया
अदालत ने कहा कि SIR प्रक्रिया प्रोपोर्शनैलिटी यानी अनुपातिकता के सिद्धांत पर खरी उतरती है और इसमें पर्याप्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं. कोर्ट ने माना कि चुनाव आयोग के पास इस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए वैध और उचित आधार थे. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने का अधिकार है और SIR उसी संवैधानिक दायित्व का हिस्सा है.