Induction Cooktop : देश के कई हिस्सों में एलपीजी गैस सिलेंडर की कमी ने लोगों की रसोई पर असर डालना शुरू कर दिया है. दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सहित कई राज्यों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं. कुछ जगहों पर सिलेंडर की आपूर्ति सीमित होने के कारण वितरण पुलिस की निगरानी में किया जा रहा है, जबकि कई छोटे रेस्टोरेंट और ढाबे अस्थायी रूप से बंद होने की खबरें भी सामने आई हैं.
इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री बढ़ी
इस संकट के बीच इंडक्शन कुकटॉप की मांग अचानक बढ़ गई है. ऑनलाइन और ऑफलाइन बाजारों में इंडक्शन स्टोव की बिक्री तेजी से बढ़ी है. कई ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर इंडक्शन कुकटॉप कुछ समय के लिए आउट-ऑफ-स्टॉक भी हो गए. 11 मार्च 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले चार दिनों में इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री पिछले चार-पांच हफ्तों की तुलना में कहीं अधिक रही है. खासकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश और कोलकाता जैसे शहरों में इसकी मांग सबसे ज्यादा देखी गई. एक प्रमुख ई-कॉमर्स कंपनी के मुताबिक, इंडक्शन कुकटॉप की मांग सामान्य दिनों की तुलना में पिछले 24 घंटों में लगभग 20 गुना तक बढ़ गई.
कैसे काम करता है इंडक्शन कुकटॉप
इंडक्शन कुकटॉप इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंडक्शन के सिद्धांत पर काम करता है. इसके अंदर एक कॉपर कॉइल लगी होती है. जब इसमें बिजली का करंट प्रवाहित होता है तो एक चुंबकीय क्षेत्र बनता है. जब इस चुंबकीय क्षेत्र के संपर्क में लोहे या स्टेनलेस स्टील जैसे धातु के बर्तन आते हैं, तो उनमें एडी करंट उत्पन्न होता है. यही करंट गर्मी पैदा करता है और बर्तन गर्म होकर खाना पकाने लगता है. इसी कारण इंडक्शन कुकटॉप पर केवल फेरोमैग्नेटिक धातुओं के बर्तन जैसे लोहे या स्टेनलेस स्टील ही सही तरीके से काम करते हैं. एल्यूमिनियम, तांबा या कांच के बर्तन इस तकनीक पर सामान्यतः काम नहीं करते.
गैस और इंडक्शन में अंतर
गैस चूल्हे और इंडक्शन कुकटॉप दोनों के अपने फायदे और सीमाएं हैं. गैस चूल्हे पर लगभग सभी प्रकार के बर्तन इस्तेमाल किए जा सकते हैं और बिजली न होने पर भी खाना पकाया जा सकता है. वहीं इंडक्शन कुकटॉप पूरी तरह बिजली पर निर्भर होता है. ऊर्जा दक्षता के मामले में इंडक्शन कुकटॉप अधिक प्रभावी माना जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार गैस चूल्हे की लगभग 60 प्रतिशत गर्मी वातावरण में बर्बाद हो जाती है और केवल करीब 40 प्रतिशत ही खाना पकाने में उपयोग होती है. इसके विपरीत इंडक्शन तकनीक लगभग 90 प्रतिशत तक ऊर्जा का उपयोग सीधे बर्तन को गर्म करने में करती है. आंकड़ों के अनुसार एक एलपीजी सिलेंडर के बराबर खाना पकाने के लिए इंडक्शन कुकटॉप लगभग 78 यूनिट बिजली खर्च कर सकता है. यदि बिजली की कीमत ₹8 प्रति यूनिट मानी जाए तो कुल खर्च करीब ₹624 बैठता है, जबकि बिना सब्सिडी वाला एलपीजी सिलेंडर कई जगह ₹900 से अधिक का पड़ रहा है.
शुरुआती खर्च और उपयोग
हालांकि इंडक्शन कुकटॉप अपनाने के लिए शुरुआती खर्च करना पड़ता है. बाजार में इसकी कीमत लगभग ₹2000 से ₹4000 या उससे अधिक तक हो सकती है. इसके अलावा फ्लैट-बॉटम स्टील या लोहे के विशेष बर्तन भी खरीदने पड़ सकते हैं. फिर भी कई लोग इसे गैस के विकल्प के रूप में नहीं बल्कि तीसरे चूल्हे की तरह इस्तेमाल करते हैं,जैसे चाय बनाना, पानी गर्म करना या हल्का खाना पकाना. इसके अलावा इंडक्शन कुकटॉप का एक फायदा यह भी है कि इससे रसोई में अतिरिक्त गर्मी नहीं बढ़ती और इसकी सफाई भी अपेक्षाकृत आसान होती है. फिलहाल गैस सिलेंडर की कमी के चलते इंडक्शन कुकटॉप की मांग में आई तेजी ने इलेक्ट्रॉनिक्स दुकानदारों और ऑनलाइन विक्रेताओं के लिए नया अवसर पैदा कर दिया है. खुदरा बाजार के कुछ व्यापारियों का कहना है कि जहां पहले एक हफ्ते में दो-तीन इंडक्शन कुकटॉप बिकते थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर लगभग दस तक पहुंच गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गैस आपूर्ति की समस्या लंबे समय तक बनी रहती है, तो घरेलू रसोई में इंडक्शन कुकटॉप का उपयोग और तेजी से बढ़ सकता है.