Iran Israel War : पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर दिखाई देने लगा है. ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है. इसका सीधा असर भारत में एलपीजी गैस, तेल और अब दवाइयों की कीमतों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.
तेल और गैस सप्लाई पर असर
खाड़ी क्षेत्र में स्थित अहम समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ पर लगातार हमलों और सुरक्षा जोखिमों के कारण तेल और अन्य जरूरी वस्तुओं की सप्लाई बाधित हो रही है. यह मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है. इसके प्रभावित होने से कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेजी देखी जा रही है. विशेषज्ञों के अनुसार यदि तनाव लंबे समय तक जारी रहा तो भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा है.
दवा उद्योग पर भी संकट के संकेत
इस बीच एक नई चिंता भारत के फार्मास्युटिकल सेक्टर को लेकर सामने आई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक दवाइयों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं. फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि की स्टार्टिंग मटेरियल (KSM) और एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) की कीमतों में पिछले कुछ दिनों में 5% से लेकर 100% तक की बढ़ोतरी देखी गई है. ये दोनों ही दवाइयों के निर्माण के लिए बेहद जरूरी घटक हैं. भारत अपनी दवा निर्माण की जरूरतों के लिए लगभग 65 से 70 प्रतिशत API और इंटरमीडिएट्स चीन से आयात करता है. ऐसे में वैश्विक तनाव, डॉलर की मजबूती और सप्लाई चेन में रुकावटें भारतीय दवा उद्योग के लिए चुनौती बन रही हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि फार्मास्युटिकल कच्चे माल का अधिकतर व्यापार डॉलर में होता है. इसलिए जब डॉलर मजबूत होता है तो आयात की लागत अपने आप बढ़ जाती है.
सॉल्वेंट और लॉजिस्टिक्स लागत भी बढ़ी
दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सॉल्वेंट्स की कीमतों में भी तेजी आई है. कुछ मामलों में इनकी लागत पिछले कुछ दिनों में 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गई है. इसके अलावा लॉजिस्टिक्स से जुड़ी समस्याएं भी सामने आ रही हैं. सुरक्षा चिंताओं और समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम के कारण कई जहाज रास्तों में फंस रहे हैं या बंदरगाहों तक समय पर नहीं पहुंच पा रहे हैं. कंटेनरों की कमी भी सप्लाई चेन को प्रभावित कर रही है. फार्मा इंडस्ट्री के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर युद्ध की स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो दवा बनाने वाले कच्चे माल की कमी भी हो सकती है. कुछ ट्रेडर्स ने अनिश्चितता के कारण नए ऑर्डर लेना भी बंद कर दिया है.
एलपीजी कीमतों से जनता परेशान
इधर एलपीजी गैस की बढ़ती कीमतों को लेकर आम लोगों में नाराजगी भी देखी जा रही है. कई उपभोक्ताओं का कहना है कि पहले से ही महंगाई ज्यादा है और अगर अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण गैस और महंगी हुई तो घरेलू बजट संभालना मुश्किल हो जाएगा. कुछ जगहों पर उपभोक्ताओं को गैस सिलेंडर की सप्लाई में देरी और एजेंसियों पर लंबी कतारों का भी सामना करना पड़ रहा है. लोगों का कहना है कि युद्ध चाहे कहीं भी हो, लेकिन उसकी मार आखिरकार आम जनता पर ही पड़ती है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो इसका असर ऊर्जा, दवाइयों और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर लंबे समय तक देखने को मिल सकता है. ऐसे में सरकार और उद्योग दोनों के लिए सप्लाई चेन को सुरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती बन सकता है.