Gyanesh kumar news : संसद में हाल के दिनों में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव गिरने के कुछ ही समय बाद विपक्षी दलों ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए नोटिस दे दिया है. यह नोटिस तृणमूल कांग्रेस की ओर से लाया गया, जिस पर संसद के दोनों सदनों के लगभग 190 विपक्षी सांसदों के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं.
मीडिया सूत्रों के मुताबिक लोकसभा के 120 से अधिक और राज्यसभा के करीब 65 सांसदों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है. हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल पद से हटाने की कोशिश नहीं, बल्कि आगामी चुनावों से पहले राजनीतिक संदेश देने की रणनीति भी हो सकता है.
चुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक गतिविधि
पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल समेत कई राज्यों में चुनाव की घोषणा कुछ ही हफ्तों में होने की संभावना है. ऐसे समय में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर विपक्ष द्वारा सवाल उठाना राजनीतिक माहौल को और गरमा रहा है. विपक्ष का आरोप है कि आयोग निष्पक्ष तरीके से काम नहीं कर रहा, जबकि चुनाव आयोग समय-समय पर इन आरोपों को खारिज करता रहा है. पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन के बाद लाखों नाम हटाए जाने के मुद्दे पर सियासी विवाद और बढ़ गया. राज्य की सत्ताधारी पार्टी ने इस प्रक्रिया का विरोध किया और इसे अदालत तक चुनौती दी. विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां हुई हैं, जबकि आयोग का दावा है कि सूची का संशोधन नियमों के तहत किया गया.
संसद में प्रस्तावों का रिकॉर्ड महत्व
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ऐसे प्रस्ताव अक्सर पास होने के लिए नहीं बल्कि संसद के रिकॉर्ड में विपक्ष के आरोप दर्ज कराने और राजनीतिक एकजुटता दिखाने के लिए लाए जाते हैं. हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर लंबी चर्चा हुई थी, हालांकि संख्या बल के अभाव में वह ध्वनिमत से गिर गया. मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव पारित कराने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है. इसके तहत सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन आवश्यक होता है.
क्या है मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया
संविधान के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जैसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है. इसके लिए संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित होना और उसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी आवश्यक होती है. प्रस्ताव स्वीकार करने से पहले जांच समिति भी बनाई जा सकती है, जो आरोपों की जांच कर अपनी रिपोर्ट देती है.
विपक्ष की रणनीति या राजनीतिक दबाव?
विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इन प्रस्तावों के जरिए चुनाव आयोग की भूमिका पर सार्वजनिक बहस तेज करना चाहता है और चुनाव से पहले अपने समर्थकों को संदेश देना चाहता है. वहीं सत्तापक्ष इसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा बता रहा है.