सुप्रीम कोर्ट के किस फैसले पर नाराज हो गए उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़…जानिए पूरा मामला

Jagdeep Dhankhar :  उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने गुरुवार को उच्चतम न्यायालय की उस टिप्पणी और सलाह पर तीखी प्रतिक्रिया दी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधेयकों पर निर्णय लेने की समय-सीमा निर्धारित करने की बात कही थी।

Jagdeep Dhankhar का सुप्रीम कोर्ट पर तीखा हमला

धनखड़ ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि न्यायालय राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकता और अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट को मिला विशेषाधिकार अब लोकतांत्रिक शक्तियों के विरुद्ध 24×7 उपलब्ध न्यूक्लियर मिसाइल बन गया है।धनखड़ राज्यसभा के प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित कर रहे थे। अपने भाषण में उन्होंने न्यायपालिका की भूमिका और उसकी सीमाओं पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अब हमारे पास ऐसे न्यायाधीश हैं, जो कानून बनाएंगे, कार्यपालिका का कार्य करेंगे और सुपर संसद की तरह कार्य करेंगे। लेकिन उनकी कोई जवाबदेही नहीं है, क्योंकि देश का कानून उन पर लागू नहीं होता।

राष्ट्रपति के खिला सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में क्या कहा

धनखड़ की यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के 8 अप्रैल के उस ऐतिहासिक निर्णय के संदर्भ में आई है, जो तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में आया था। इस फैसले में कोर्ट ने राज्यपाल के पास लंबित विधेयकों को मंजूरी न देने की प्रक्रिया को असंवैधानिक करार दिया था। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा था कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है और उन्हें विधेयकों पर एक महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। साथ ही, यदि राज्यपाल किसी बिल को राष्ट्रपति के पास भेजते हैं, तो राष्ट्रपति को भी तीन महीने के भीतर अंतिम निर्णय लेना होगा।

कोर्ट ने आदेश में क्या कहा था

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 201 का हवाला देते हुए राज्यपाल और राष्ट्रपति की भूमिका को लेकर चार महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखांकित किया:

  • निर्णय लेना अनिवार्य: अगर कोई बिल राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को विचार के लिए भेजा गया है, तो राष्ट्रपति को उस पर मंजूरी देनी होगी या अस्वीकृति का स्पष्ट निर्णय देना होगा। उसे अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता।
  • न्यायिक समीक्षा संभव: कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति के निर्णय की ज्यूडिशियल रिव्यू यानी न्यायिक समीक्षा हो सकती है, खासकर तब जब फैसला मनमाना या दुर्भावनापूर्ण प्रतीत हो।
  • समय सीमा का पालन जरूरी: राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। यदि देरी होती है, तो उसके कारण बताना जरूरी होगा।
  • बिल को बार-बार लौटाना गलत: यदि विधानसभा किसी बिल को फिर से पास करके राष्ट्रपति को भेजती है, तो राष्ट्रपति को उस पर अंतिम निर्णय लेना ही होगा। बार-बार बिल लौटाने की प्रक्रिया संवैधानिक नहीं मानी जाएगी।

जस्टिस वर्मा मामले में भी Jagdeep Dhankhar  ने उठाए सवाल

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने हाल ही में सामने आए जस्टिस वर्मा के घर नकदी मिलने के मामले का भी उल्लेख किया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब एक पूर्व न्यायाधीश के घर से अधजली नकदी बरामद हुई है, तो अब तक FIR क्यों नहीं दर्ज हुई? क्या कुछ लोग कानून से ऊपर हैं? धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले की जांच के लिए गठित इन-हाउस कमेटी की वैधता पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि इसका कोई संवैधानिक आधार नहीं है। ऐसी कमेटियां केवल सिफारिश दे सकती हैं, कार्रवाई का अधिकार संसद के पास है।

संवैधानिक संतुलन की जरूरत पर ज़ोर

उपराष्ट्रपति ने अपने वक्तव्य में यह भी कहा कि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार सर्वोपरि होती है और सभी संस्थाओं को अपनी-अपनी संवैधानिक सीमाओं में रहकर काम करना चाहिए। उन्होंने न्यायपालिका की भूमिका को सम्मानजनक बताते हुए कहा, “न्यायपालिका हमेशा सम्मान की प्रतीक रही है, लेकिन हाल के कुछ मामलों में देरी और अस्पष्टता के कारण आम लोगों में असमंजस पैदा हो रहा है। उपराष्ट्रपति धनखड़ की इस टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के संतुलन को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से जहां गवर्नर और राष्ट्रपति की निर्णय प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध बनाने की दिशा में पहल हुई है, वहीं उपराष्ट्रपति ने न्यायपालिका की जवाबदेही और सीमाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

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