Indian economy news : प्रधानमंत्री Narendra Modi ने रविवार (10 मई) को देशवासियों से पेट्रोलियम उत्पादों और सोने पर खर्च कम करने की अपील की. उन्होंने कहा कि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को देखते हुए नागरिकों को ईंधन बचत, स्थानीय उत्पादों के उपयोग और गैर-जरूरी आयात कम करने की दिशा में योगदान देना चाहिए. इस दौरान प्रधानमंत्री ने लोगों से मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन का अधिक इस्तेमाल करने, इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को अपनाने, कोविड काल की तरह वर्क-फ्रॉम-होम व्यवस्था को फिर बढ़ावा देने और एक वर्ष तक गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं तथा सोने की खरीद से बचने का आग्रह किया. उन्होंने कहा कि जहां मेट्रो उपलब्ध है, वहां मेट्रो का उपयोग करें. इससे पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम होगी और विदेशी मुद्रा की बचत होगी.
बढ़ते आयात बिल से बढ़ रहा दबाव
रिपोर्ट्स की मानें तो भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 89% आयात करता है. पिछले एक वर्ष में कच्चे तेल की कीमत लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 113 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गई है. इसका सीधा असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और आयात बिल पर पड़ रहा है. सोने के मामले में भी स्थिति चुनौतीपूर्ण है. भारत लगभग पूरा सोना आयात करता है. पिछले वर्ष देश ने केवल सोने के आयात पर करीब 72 अरब डॉलर खर्च किए यानी औसतन 6 अरब डॉलर प्रति माह.
RBI का गोल्ड रिजर्व और घरेलू खरीद का अर्थव्यवस्था पर होता है अलग प्रभाव
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने पिछले एक वर्ष में लंदन से 168 टन सोना अपने भंडार में जोड़ा है. मार्च 2026 तक RBI के पास कुल 880 टन सोना हो चुका है. भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में अब सोने की हिस्सेदारी 16% तक पहुंच गई है, जो पिछले वर्ष 10% थी. हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार RBI द्वारा रिजर्व प्रबंधन के लिए खरीदा गया सोना और घरेलू उपभोक्ताओं द्वारा खरीदा गया सोना अर्थव्यवस्था पर अलग प्रभाव डालते हैं. आम लोगों द्वारा खरीदा गया आयातित सोना सीधे डॉलर की मांग बढ़ाता है, जिससे चालू खाता घाटा और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है. रुपये में कमजोरी आने पर सोना और महंगा हो जाता है. इससे एक दुष्चक्र बनता है, जिसमें लगातार बढ़ते आयात और डॉलर बहिर्गमन (देश में आने वाले डॉलर की तुलना में बाहर जाने वाले डॉलर की मात्रा का बढ़ जाना) के कारण उपभोक्ताओं को सोने के लिए अधिक रुपये चुकाने पड़ते हैं.
पेट्रोल-डीजल कीमतों पर बढ़ सकता है दबाव
सरकारी तेल विपणन कंपनियां (OMCs) अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों के बावजूद खुदरा ईंधन कीमतों को स्थिर बनाए हुए हैं. लेकिन आयात लागत और खुदरा कीमत के बीच बढ़ते अंतर के कारण इन कंपनियों पर भारी वित्तीय दबाव बढ़ गया है. एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) पर भी कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है. ऐसे में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईंधन कीमतें बढ़ती हैं तो इसका असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहेगा. भारत में अधिकांश माल ढुलाई डीजल आधारित परिवहन पर निर्भर है, इसलिए ईंधन महंगा होने से खाद्य पदार्थों, परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों में तेजी आ सकती है.
खाद्य तेल आयात भी बड़ी चुनौती
प्रधानमंत्री ने खाद्य तेल की खपत कम करने की भी अपील की. उन्होंने कहा कि खाद्य तेल आयात पर भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है और इसकी खपत में कमी देश की अर्थव्यवस्था और लोगों के स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभदायक हो सकती है. भारत पाम ऑयल के लिए इंडोनेशिया और मलेशिया, जबकि सूरजमुखी तेल के लिए रूस और यूक्रेन पर निर्भर है. हालांकि सरसों तेल जैसे घरेलू विकल्प मौजूद हैं, लेकिन उनकी उत्पादन क्षमता इतनी नहीं है कि वे आयातित तेल की पूरी मांग पूरी कर सकें. इसके अलावा विभिन्न राज्यों में अलग-अलग खाद्य तेलों की खपत की पारंपरिक आदतें भी बदलाव को कठिन बनाती हैं.
उर्वरक आयात और खेती पर असर
प्रधानमंत्री ने रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को आधा करने की भी सलाह दी. उन्होंने कहा कि उर्वरक आयात पर भी भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है. हाल के महीनों में यूरिया और DAP (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है. यूरिया की कीमत फरवरी में 508 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 935 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है. वहीं DAP की कीमत 680 डॉलर से बढ़कर लगभग 925 डॉलर प्रति टन हो गई है. भारत अपनी लगभग 75% यूरिया जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है. घरेलू यूरिया उत्पादन भी LNG आयात पर आधारित है, जिसका बड़ा हिस्सा कतर, UAE और ओमान से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते आता है.कृषि क्षेत्र के लिए स्थिति इसलिए भी चिंताजनक मानी जा रही है क्योंकि खरीफ सीजन के लिए भारत को 19.4 मिलियन टन यूरिया की आवश्यकता है, जबकि अप्रैल की शुरुआत में उपलब्ध स्टॉक केवल 5.5 मिलियन टन था. मार्च में घरेलू यूरिया उत्पादन भी सामान्य स्तर से काफी कम रहा.विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खरीफ बुवाई से पहले पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध नहीं हो पाए, तो खेती की लागत बढ़ेगी और इसका असर खाद्य महंगाई पर पड़ सकता है.