Fake News Exposed : देश में फेक न्यूज अब महज अफवाहों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक संगठित इंडस्ट्री का रूप ले चुकी है. हालिया रिपोर्ट बताती है कि भारत में फैलने वाली फेक न्यूज में लगभग आधी यानी 46% खबरें राजनीतिक मकसद से प्रेरित होती हैं. ये चौंकाने वाला खुलासा इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस और साइबर पीस फाउंडेशन की एक संयुक्त स्टडी से सामने आया है, जो दिसंबर 2024 में प्रकाशित हुई थी. स्टडी में बताया गया कि फेक न्यूज का सबसे बड़ा स्रोत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हैं, जहां 77.4% फेक न्यूज सर्कुलेट होती है. वहीं, मुख्यधारा मीडिया (मेनस्ट्रीम मीडिया) से केवल 23% मामले ही सामने आए. सबसे ज्यादा फेक न्यूज X (पूर्व में ट्विटर) पर 61% और फेसबुक पर 34% शेयर की गईं.
इस कैटेगरी में सबसे ज्यादा फैलती है Fake News
स्टडी के मुताबिक भारत में फेक न्यूज की इन तीन प्रमुख श्रेणियों में ज्यादा मिलती हैं. राजनीतिक फेक न्यूज- 46%, जनरल इश्यूज से जुड़ी- 33.6% , धार्मिक फेक न्यूज- 16.8% . यानि कुल 94% फेक न्यूज इन्हीं तीन कैटेगरी के इर्द-गिर्द घूमती है. विशेषज्ञों का मानना है कि पॉलिटिकल फेक न्यूज का मकसद आम जन की राय को प्रभावित करना होता है, जिससे चुनावी नतीजों तक पर असर पड़ सकता है.
Fake News : क्या कहता है कानून?
फेक न्यूज से निपटने के लिए संसद में एक नया कानून प्रस्तावित किया गया है, ‘प्रॉहिबिशन ऑन फेक न्यूज ऑन सोशल मीडिया-2023’. इस प्रस्तावित कानून के तहत एक रेगुलेटरी अथॉरिटी का गठन किया जाएगा, जो सोशल मीडिया पर फेक कंटेंट को मॉनिटर और ब्लॉक करेगी. इसमें 5 लाख रुपये तक का जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान है. मौजूदा कानून भी सक्रिय हैं, जैसे भारतीय न्याय संहिता (BNS) की निम्न धाराएं:
- धारा 353 – झूठी रिपोर्ट्स पब्लिश करने या ब्रॉडकास्ट करने पर 3 साल तक की सजा या जुर्माना या दोनों.
- धारा 197 (1D) – भारत की संप्रभुता, एकता या सुरक्षा को खतरे में डालने वाली फेक न्यूज पर 3 साल की सजा या जुर्माना.
- धारा 153A और 505 – सांप्रदायिक विद्वेष और सामाजिक वैमनस्य फैलाने वाली सूचनाओं पर कार्रवाई के लिए.
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति फेक न्यूज को प्लान करता है और दूसरा उसे फैलाता है, तो दोनों समान रूप से दोषी माने जाएंगे. यही नहीं, अगर किसी न्यूज एजेंसी या कंपनी की जानकारी में यह होता है और फिर भी फेक कंटेंट पब्लिश होता है, तो एडिटर भी जिम्मेदार माना जाएगा.
फेक न्यूज के बदलते स्वरूप: फॉल्सिटी, फोर्जरी, मॉर्फिंग
कोर्ट में आने वाले मामलों की समीक्षा से पता चलता है कि फेक न्यूज आज सिर्फ टेक्स्ट तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब यह टेक्नोलॉजी की मदद से कई रूप ले रही है. AI और डीपफेक जैसी तकनीकों ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है. जिसमें
- फॉल्सिटी: फर्जी डॉक्यूमेंट्स या स्टेटमेंट्स, जो किसी अस्तित्वहीन व्यक्ति के नाम से हों.
- फोर्जरी: किसी असली व्यक्ति के नाम का फर्जी डॉक्यूमेंट बनाना और उस पर साइन कर देना.
- मॉर्फिंग:किसी के चेहरे या आवाज को एडिट करके नकली वीडियो बनाना. चुनावी समय में ऐसे मामलों की संख्या में काफी इज़ाफा होता है.
सूचना की ताकत, जिम्मेदारी के साथ
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के बाद इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस जुटाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. अब जांच एजेंसियां IP एड्रेस ट्रेस करती हैं, सोशल मीडिया डेटा की ट्रैकिंग करती हैं, डिलीटेड डिजिटल डॉक्यूमेंट्स को रिकवर करती हैं. अधिकारियों के मुताबिक, कोई भी डिजिटल दस्तावेज पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता. अगर एक्सेस किया जाए तो सटीक सोर्स तक पहुंचा जा सकता है. फेक न्यूज केवल एक झूठी खबर नहीं है, बल्कि यह जनता की राय, चुनावी नतीजों और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करने वाला गंभीर अपराध बन चुका है. इसमें जहां टेक्नोलॉजी एक ओर सुविधा है, वहीं चुनौती भी है. समाज, सरकार और मीडिया तीनों की साझा जिम्मेदारी है कि फेक न्यूज के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठाएं और सही सूचना के लिए जागरूकता फैलाएं.