पटना। बिहार में राजनीति सदैव से जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है, और यह स्थिति आज भी जारी है। नतीजा होता है कि राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति में इसी जातीय समीकरण को साधने की पूरी कोशिश करती है। बिहार की प्रमुख राजनीतिक पार्टी और असके Party President की नियुक्तियों से स्पष्ट दिखता है कि बिहार की राजनीति में जातीय पहचान का महत्व किस हद तक बना हुआ है। नजर डालते हैं प्रमुख पार्टी और असके अध्यक्षों के जातीय पहचान पर।
बिहार के प्रमुख राजनीतिक दलों के Party President और उनका जातीय समीकरण
- जनता दल यूनाइटेड (JDU) और ओबीसी समुदाय
जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा हैं, जो कोइरी समुदाय से आते हैं। ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) से जुड़े कुशवाहा का चयन इस बात का संकेत है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नेतृत्व करने वाली पार्टी ओबीसी समुदाय में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। कोइरी जाति बिहार के कुछ हिस्सों में महत्वपूर्ण संख्या में है, और जेडीयू इस वर्ग के वोट बैंक को मजबूती से साधने का प्रयास करती रही है।
- भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और व्यापारी वर्ग
हाल ही में भाजपा ने दिलीप जायसवाल को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है, जो वैश्य समुदाय से आते हैं। वैश्य जाति, जो मुख्य रूप से व्यापारिक समुदाय है। बिहार में ये समुदाय भाजपा के पारंपरिक मतदाता माने जाते हैं। इसके माध्यम से भाजपा अपने पुराने वोट बैंक को मजबूत करने और प्रदेश में वैश्य समुदाय का समर्थन प्राप्त करने की कोशिश कर रही है।
- राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और उच्च जाति समीकरण
लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाले राजद ने जगदानंद सिंह को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी है, जो राजपूत समुदाय से हैं। यह निर्णय राजद की उच्च जाति के लोगों के बीच पैठ बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। राजद का पारंपरिक आधार यादव और मुस्लिम समुदाय रहा है, लेकिन जगदानंद सिंह जैसे उच्च जाति के नेता की नियुक्ति से पार्टी अपने वोट बैंक का विस्तार करने और राज्य में अगड़ी और पिछड़ी जाति के बिच संतुलन करने का पार्टी का एक प्रयास है।
- कांग्रेस और भूमिहार समुदाय
कांग्रेस ने अखिलेश सिंह को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है, जो भूमिहार समुदाय से आते हैं। भूमिहार जाति बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, और कांग्रेस का यह कदम उन्हें अपने पक्ष में लाने की एक कोशिश है। बिहार में कांग्रेस की स्थिति कमजोर है, इसमें कोई दो राय नहीं है। पार्टी को उच्च जाति के लोगों के बीच समर्थन जुटाने में और राज्य में अपनी पैठ मजबूत करने की दिशा में एक प्रयास भर है।
- हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) और भूमिहार वोट बैंक
पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हम से अनिल कुमार प्रदेश अध्यक्ष है। ये भी भूमिहार समुदाय से आते हैं। मांझी की पार्टी दलित और महादलित समुदाय पर केंद्रित रही है, लेकिन अनिल कुमार के जरिए भूमिहार समुदाय के बीच अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश में हैं।
- लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और ब्राह्मण समुदाय
चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजू तिवारी है, जो ब्राह्मण समुदाय से हैं। पार्टी का यह फैसला उसके विस्तार और जातिगत संतुलन साधने की दिशा में के लिए है।
- जन सुराज और दलित नेतृत्व
प्रशांत किशोर की अगुवाई वाले जन सुराज पार्टी ने मनोज भारती को Party President बनाया है, जो दलित समुदाय से आते हैं। जन सुराज का यह कदम दलित वर्ग के बीच अपनी पकड़ बनाने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। प्रशांत खुद ब्राह्मण समाज से आते हैं।
बिहार में कितना जरूरी है जातीय समीकरण ?
बिहार में जाति हमेशा से ही राजनीति का केंद्र बिंदु रही है। हर राजनीतिक दल ने अपने Party President का चयन करते समय इस जातीय गणित को बखूबी साधा है। चाहे वह ओबीसी समुदाय हो, उच्च जाति, व्यापारी वर्ग या दलित वर्ग हर पार्टी ने अपने-अपने आधार को मजबूत करने के लिए जातीय समीकरणों को ध्यान में रखा है। इसलिए 2 अक्टूबर को राजनीतिक पार्टी बनी जनसुराज भी इसी कदम पर आगे बढ़ते हुए एक ऐसे समुदाय से अपना Party President चुना जिस वोट बैंक की जरूरत सबसे अधिक पार्टी को है। मनोज भारती के चयन से यह साफ है कि बिहार की राजनीति में जातीय संतुलन और पहचान का खेल अभी भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पहले था।