आरण्य देवी : बिहार में में आरा का नाम आते ही सबसे पहले जेहन में कुछ आता है तो वो है मां आरण्य देवी का नाम. आरण्य देवी के नाम पर ही आरा का नाम रखा गया है. आरा के लाखों लोगों के आस्था, विश्वास और श्रद्धा की प्रतीक हैं आरण्य माता. यहां का इतिहास भी बहुत पुराना है. महाभारत काल से यहां का इतिहास जुड़ा है.
ये है इतिहास
कहा जाता है कि इस मंदिर के चारों ओर पहले वन था पांडव वनवास के क्रम में आरा में भी ठहरे थे. पांडवों ने यहां आदिशक्ति की पूजा-अर्चना की. मां ने युधिष्ठिर को स्वप्न में संकेत दिया कि वह आरण्य देवी की प्रतिमा स्थापित करें. तब धर्मराज युधिष्ठिर ने यहां मां आरण्य देवी की प्रतिमा स्थापित की थी.
वास्तुकला संवत् 2005 में स्थापित यह मंदिर संगमरमर की थी लेकिन अब मंदिर का नवनिर्माण हो रहा है. करोड़ों की लागत से 108 फीट उच्चा भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है. मंदिर का मुख्य द्वार पूरब की तरफ है. मुख्य द्वार के ठीक सामने मां की भव्य प्रतिमाएं हैं.
द्वापर युग में इस स्थान पर राजा म्यूरध्वज राज करते थे. इनके शासन काल में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ यहां पहुंचे थे. उन्होंने राजा के दान की परीक्षा ली. इस मंदिर में छोटी प्रतिमा को महालक्ष्मी और बड़ी प्रतिमा को सरस्वती का रूप माना जाता है.
108 फीट उच्च भव्य मंदिर का हो रहा है निर्माण कार्य
आरण्य देवी मंदिर ट्रस्ट सदस्य भीम सिंह भवेश ने बताया कि इतिहास प्राचीन है, लेकिन मंदिर का जितना महत्व है. उस मुताबिक भव्यता नहीं थी. उसके बाद मेरे द्वारा शहर के बुद्धिजीवी और उद्योगपति साथ बैठक कर पहल शुरू की गई, जिसके बाद एक ट्रस्ट के गठन हुआ. अब शहर के जनता के साथ भव्य मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है. 108 फीट उच्च भव्य मंदिर में निर्माण कार्य लगा है. अगले दुर्गा पूजा तक आरा के जनता को भव्य मंदिर का दर्शन हो पायगा.