सामाजिक एकजुटता और सामुहिक विकास का प्रतीक है छठ, घर से लेकर घाट तक देखने लायक रहता है लोगों का उत्साह

Chhath Ghat : छठ पूजा सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह पूरे समाज को एक सूत्र में बाँधने वाला उत्सव है। यह त्योहार जैसे-जैसे पास आता है, पूरे गाँव, कस्बे और शहरों में माहौल बदल जाता है। हर तरफ सफाई, सजावट और भक्ति की लहर दौड़ पड़ती है। छठ पूजा की सबसे खास बात यह है कि इसमें सिर्फ व्रती ही नहीं, बल्कि पूरा समाज हिस्सा लेता है। जो लोग व्रत नहीं रखते, वे भी घाटों की तैयारी और पूजा में पूरे मन से शामिल होते हैं।

छठ घाटों की सफाई और तैयारी

छठ पर्व के पहले दिन से ही घाटों की सफाई शुरू हो जाती है। गाँवों में लोग मिलकर तालाब, नदी या पोखरे के किनारे कीचड़ हटाते हैं, पानी साफ करते हैं और रास्तों को ठीक करते हैं ताकि व्रती महिलाएँ आसानी से घाट तक पहुँच सकें। शहरों में नगर निगम की टीमें और स्थानीय युवा मिलकर घाटों पर झाड़ू लगाते हैं, ब्लीचिंग पाउडर डालते हैं और सुंदर रौशनी की व्यवस्था करते हैं। यह काम सिर्फ पूजा की तैयारी नहीं, बल्कि एक सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक होता है।

सजावट की रौनक

जब घाट साफ-सुथरा हो जाता है, तो उसकी सजावट शुरू होती है। जगह-जगह केले के पत्तों, गन्ने के डंठलों और आम के पत्तों से तोरण बनाए जाते हैं। कई जगह रंगोली से पूरा घाट चमक उठता है। शाम के समय दीयों की कतारें और बिजली की झालरें घाट को किसी मंदिर जैसा रूप दे देती हैं। बच्चे रंगीन कागज और फूलों से सजावट में मदद करते हैं। यह नज़ारा इतना सुंदर होता है कि जो वहाँ जाता है, उसकी आँखें भक्ति और गर्व से भर जाती हैं।

जो व्रती नहीं होते, वे भी निभाते हैं भूमिका

छठ पूजा की सबसे सुंदर बात यही है कि इसमें भेदभाव नहीं होता। चाहे कोई व्रती हो या न हो, हर कोई किसी न किसी रूप में भाग लेता है। कुछ लोग घाट सजाने में मदद करते हैं, कुछ लोग व्रती महिलाओं को फल और पूजा का सामान पहुँचाते हैं, कई युवा पानी के अंदर खड़े होकर अर्घ्य के समय दीए जलाने में सहयोग करते हैं , यह सामूहिक सहयोग छठ को एक “जन उत्सव” बना देता है।

शाम की आरती और सामूहिक भक्ति

जब शाम होती है और सूर्य ढलने लगता है, तो घाटों पर हजारों दीये जगमगा उठते हैं। व्रती महिलाएँ हाथों में सूप लेकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं। उनके साथ जो लोग व्रत नहीं करते, वे भी आरती में शामिल होकर दीप जलाते हैं, गीत गाते हैं और हाथ जोड़कर सूर्य देव से परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं। उस पल हर चेहरा श्रद्धा और शांति से भरा होता है।

छठ घाटों की सजावट और उसमें सबकी भागीदारी यह दर्शाती है कि यह त्योहार सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि एकता, प्रेम और सहयोग का प्रतीक है। जो व्रती नहीं होते, वे भी घाट की सफाई, सजावट और सेवा के माध्यम से इस आस्था के उत्सव का हिस्सा बन जाते हैं। यही कारण है कि छठ पूजा आज भी समाज को जोड़ने वाला सबसे सुंदर त्योहार माना जाता है — जहाँ हर दीपक सिर्फ श्रद्धा नहीं, बल्कि साथ होने की भावना भी जलाता है।

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