Cybercrime and AI : डिजिटल युग में अब देखना भी यकीन करने का आधार नहीं रहा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बने डीपफेक वीडियो और ऑडियो भारत के लिए एक नया और खतरनाक डिजिटल खतरा बनकर उभर रहे हैं। ये न सिर्फ हकीकत को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं, बल्कि लोगों की राय प्रभावित करते हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भरोसा कमजोर करते हैं। भारत में 85.5% घरों में स्मार्टफोन मौजूद हैं,जो बैंक, स्कूल, मनोरंजन और जानकारी का प्राथमिक माध्यम बन चुके हैं। ऐसे में डिजिटल भ्रम फैलाना पहले की तुलना में बहुत आसान और बेहद खतरनाक हो गया है।
चुनावों में भी चले डीपफेक, सच और झूठ की रेखा धुंधली
बीते कुछ चुनावों में डीपफेक सिर्फ मनोरंजन का हिस्सा नहीं रहे, बल्कि एक तरह से कैम्पेन टूल बन गए। जहां कुछ वीडियो में दिवंगत नेताओं को जिंदा दिखाया गया तो एक वायरल क्लिप में PM नरेंद्र मोदी महिलाओं के साथ गरबा करते दिखे और दूसरी फेक वीडियो में कमलनाथ एक सरकारी योजना की आलोचना करते हुए नजर आए। बिहार चुनाव के बाद मैथिली ठाकुर को लेकर भी कई सारे फेक वीडियो वायरल हुई. हालांकि बाद में जांच और गिरफ्तारियां हुईं.
साइबरक्राइम में AI का इस्तेमाल 80% तक बढ़ा
साइबरसिक्योरिटी विशेषज्ञों का कहना है कि 2024 में 80% फ़िशिंग कैंपेन AI-आधारित थे। जैसे ड्राफ्ट ई-मेल, आवाज की नकल, चेहरे की क्लोनिंग सब कुछ मिनटों में तैयार हो गया. AI फोटोज, ऑडियो और वीडियो को इतनी सटीकता से नकली बना देता है कि असली और नकली में फर्क कर पाना मुश्किल होता जा रहा है। TOI की एक रिपोर्ट में कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के प्रोफेसर हनी फरीद कहते हैं कि जब आप हर चीज फर्जी बना सकते हैं, तो असली पर भरोसा कैसे करेंगे? धीरे-धीरे सब कुछ शक के दायरे में आ जाता है।
शहरी युवा सबसे ज्यादा खतरे में
भारत में 15-29 आयु वर्ग के 97% शहरी युवा स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पीढ़ी डीपफेक-आधारित गलत जानकारी के सबसे बड़े जोखिम पर है। प्रो. फ़रीद के अनुसार 2016 में डीपफेक मजाक थे। अब टेक्नोलॉजी इतनी विकसित हो चुकी है कि लिप सिंक और चेहरों की क्लोनिंग अत्यंत वास्तविक दिखती है। यह खासकर महिलाओं के लिए गंभीर खतरा है, क्योंकि नॉन-कंसेंशुअल सेक्सुअल डीपफेक तेजी से बढ़ रहे हैं।
भारत को तुरंत कदम उठाने की जरूरत
नवंबर 2023 में अभिनेत्री रश्मिका मंदाना का एक डीपफेक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उनका चेहरा आपत्तिजनक कंटेंट पर लगाया गया था। इस घटना ने देशभर में आक्रोश पैदा किया और डीपफेक की भयावहता को उजागर किया। प्रो. फ़रीद ने बताते हैं कि डीपफेक शब्द की शुरुआत भी एक Reddit यूज़र द्वारा बनाई गई नकली पोर्न कंटेट से हुई थी। वह कहते हैं कि आज इसे Generative AI कहकर एक तरह से रीब्रांड कर दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि AI के तेजी से विकसित होते स्वरूप को देखते हुए कानूनी व्यवस्थाएँ मजबूत करनी होंगी,डिजिटल साक्षरता बढ़ानी होगी और टेक्नोलॉजी, सरकार, मीडिया व साइबर एजेंसियों को मिलकर काम करना होगा प्रो. फ़रीद कहते हैं कि हमें हर डिजिटल कंटेंट को रियल या नॉट रियल के लेबल के साथ पेश करना चाहिए। पारदर्शिता ही समाधान है.