Bhikhari Thakur : बिहार की धरती हमेशा से ऐसी रही है जिसने देश को नेताओं, साहित्यकारों और कलाकारों की एक लंबी शृंखला दी है। इन्हीं में से एक महान लोक कलाकार थे भिखारी ठाकुर, जिन्हें लोग स्नेहपूर्वक “बिहार का शेक्सपियर” कहते हैं। वे केवल एक कलाकार नहीं थे, बल्कि एक समाज सुधारक, लेखक और जागरूक जनसेवक थे जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से समाज की कड़वी सच्चाइयों को सामने रखा। उनकी रचनाएँ सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करती हैं।
बिहार की मिट्टी से उठी लोककला की आवाज़
भिखारी ठाकुर का जन्म बिहार के छपरा जिले के एक छोटे से गाँव में हुआ था। पढ़ाई-लिखाई में ज्यादा अवसर न मिलने के बावजूद, उनमें लोकभाषा, लोकगीत और लोकनाट्य के प्रति गहरा लगाव था। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा गाँव-गाँव घूमकर नाटक करने में बिताया। उनके नाटकों में गरीबी, स्त्री शोषण, दहेज प्रथा, शराबबंदी, जातिवाद और प्रवास जैसे विषय प्रमुख रहे। उन्होंने समाज की उन बुराइयों को दिखाया जिन पर लोग बात करने से डरते थे।
लोककला से समाज सुधार की शुरुआत
भिखारी ठाकुर किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े थे, लेकिन उनकी रचनाएँ राजनीति की सच्ची आत्मा को दर्शाती थीं। वे मंच से राजनीति नहीं करते थे, लेकिन जनता के मन की बात कहकर उन्होंने राजनीति की असली परिभाषा को जिया। उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ — ‘बेटी बेचवा’, ‘गबरघिचोर’, ‘विधवा विलाप’ — समाज के उस तबके की आवाज़ बनीं, जिसे अक्सर अनसुना कर दिया जाता था। इन नाटकों में उन्होंने दिखाया कि कैसे एक पिता मजबूरी में अपनी बेटी को बेच देता है, या कैसे प्रवासी मजदूरों की जिंदगी अपने ही घर में पराई हो जाती है।
राजनीति से दूर, लेकिन जनसेवा से जुड़ा कला जीवनॉ
भिखारी ठाकुर की भाषा बेहद सरल थी, लेकिन उनके संवादों में ऐसी ताकत थी कि लोग रातभर उनके नाटक देखते और अगले दिन उसी पर चर्चा करते थे। वे खुद ही लेखक, निर्देशक, अभिनेता और गायक थे। उनके नाटकों में हास्य, व्यंग्य और भावनाओं का अद्भुत संगम था। यही कारण है कि उन्हें “बिहार का शेक्सपियर” कहा गया — क्योंकि जिस तरह विलियम शेक्सपियर ने इंग्लैंड की आम जनता की कहानियाँ लिखीं, उसी तरह भिखारी ठाकुर ने बिहार की मिट्टी की सच्चाइयों को शब्द दिए।
‘बिहार का शेक्सपियर’ कहे जाने के पीछे की वजह
उनकी कला में सबसे खास बात यह थी कि वे मंच को समाज सुधार का माध्यम मानते थे। वे कहते थे, “नाटक जनता का आईना है।” उन्होंने दिखाया कि कला सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बदलाव का हथियार भी हो सकती है। भिखारी ठाकुर की मंडली बिहार के गांवों में घूमकर प्रदर्शन करती थी, और लोग उनके नाटकों से प्रेरित होकर अपनी सोच बदलने लगे थे।
आज भी जीवित है भिखारी ठाकुर की विरासत
आज भी भिखारी ठाकुर की विरासत जिंदा है। भोजपुरिया सिनेमा, लोकगीतों और रंगमंच में उनकी झलक दिखाई देती है। हर साल बिहार में उनकी जयंती पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं और कलाकार उनके नाटकों का मंचन करते हैं। उन्होंने जो बीज बोया था, वह आज भी नई पीढ़ी को सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ पढ़ा रहा है। भिखारी ठाकुर ने नाटक के जरिए जो क्रांति शुरू की थी, वह आज भी जारी है — क्योंकि उन्होंने सिर्फ किरदार नहीं निभाए, बल्कि समाज की आत्मा को शब्द दिए।