राजनीति जब भी करवट लेती है केंद्र में बिहार होता हैं। लेकिन आजादी के बाद से जिस तरह से इस राज्य की उपेक्षा की गई है। विकास के दौर में इस राज्य का पिछड़ जाना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है। सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक महत्वाकांक्षा ने इस राज्य को डस लिया है जिसके उपचार की बातें तो हर कोई करता है लेकिन जमीनी हकीकत इन जादुई जुमले से काफी अलग है। इसमें गलती सरकार की है या फिर सरकार बनाने वाली जनता की इसके कोई एक प्रमाण नहीं है। राज्य के इतिहास के पन्ने पर कभी जनता के नतीजों पर आपका दिल पसीजता है तो कभी सरकार की उदासीन रवैये आपको हैरान करती हैं। हमेशा सुर्खियों में रहने वाला यह राज्य एक बार फिर से सुर्खियों में हैं। देश की नवनिर्मित सरकार में इस राज्य के 8 राजनेताओं को मंत्री पद दिया गया। आंकड़ों में यह दूसरा सबसे बड़ा नंबर है। राज्य में इस बार 8 सांसदों को मंत्रीपरिषद में हिस्सेदार बनाया गया हैं। जिसमें 4 कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं। जिसके बाद यह सुर्खियां बन रही हैं कि बीमारू राज्यों में गिना जाने वाला बिहार में इस बार विकास की ऐसी गंगा बहेगी, जिसके बेग मे राज्य की प्रमुख समस्या प्रवाहित कर दी जाएगी। विकास की इस भविष्यवाणी पर फिलहाल कुछ कहना उचित नहीं होगा, लेकिन आप इतना तो समझ ही सकते है कि चुनावी जुमले सिर्फ चुनाव तक सीमित रह जाते हैं।
नीतीश कुमार बने किंगमेकर
एनडीए सरकार के इस तीसरे कार्यकाल में दूसरी सबसे बड़ी संख्या में मंत्री पद पाने वाले बिहार की राजनीति जातीय आधार पर टिकी होती हैं। कहते हैं जो इसका तोड़ निकाल लेता है सत्ता उसकी जागीर हो जाती है। इसका ठीक ठीक उदाहरण आप वर्तमान मुख्यमंत्री की राजनीति में देख सकते हैं। कई बार पाला बदलने वाले नीतीश कुमार ने जब पिछले दिनों अब तक का आखिर बार पाला बदला तो ऐसी अटकले चली कि नीतीश कुमार की विश्वनीयता को जनता ने समझ लिया है। उनकी राजनीति अपने अंतिम दौर में चल रही हैं। बिहार अब नए विकल्प की तलाश में है, क्योंकि नीतीश कुमार अब प्रासंगिक नहीं रहें। लेकिन राज्य की राजनीति को आप इतने आसान शब्दों में समझ जाए फिर काहे की राजनीति। लोकसभा चुनाव के नतीजें आए तो पूरे देश की एग्जिट पोल की तरह नीतीश कुमार को लेकर चल रही अटकलें औंधे मुंह गिर गई। नीतीश ने न सिर्फ राज्य में गठबंधन को जीत दिलाया बल्कि केंद्र में सरकार बनाने के लिए किंगमेकर की भूमिका में रहें। हालांकि आंकड़ों के खेल में नीतीश के बिना भी एनडीए बहुमत के पार थी लेकिन राजनीति सिर्फ आंकड़ों के खेल से कहाँ चलता है। आँकड़े तो आपकी जीत और हार के अंतर मात्र हैं। जिसका उदाहरण है कि राज्य में एनडीए को जिन 30 सीटों पर सफलता मिली है उसमें बीजेपी और LJPRV को मिली कई वोटों के लिए भले ही EVM में कमल और हेलिकॉप्टर का बटन दबाया गया लेकिन उन वोटों पर मुहर तीर का लगा हुआ था नतीजा हुआ कि राज्य में 18.52 फीसदी वोट और 12 सीटों के साथ भी नीतीश प्रासंगिक बने हुए हैं।
मंत्री पद के जरिए बिहार में जातीय जुगलबंदी का प्रयास
1999 के लोकसभा चुनाव के बाद बनी NDA की प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में राज्य से 9 मंत्री थे। उसके बाद फिर जब 2004 में UPA की सरकार बनी तो राज्य से करीब करीब इतने ही मंत्री थे फिर 2009 में UPA के ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में बिहार से नौ मंत्री बने थे। उसके बाद जब एनडीए की सरकार बनी तो राज्य से 6 सांसदों को मंत्रीपरिषद में शामिल किया गया। इस बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में डेढ़ दशक बाद एक बार फिर से बिहार का प्रतिनिधित्व बढ़ा है। राज्य से 8 सांसदों ने मंत्री पद की शपथ ली हैं। ऐसी संभावना राज्य मे अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव और इस साल बीजेपी के उम्मीद से कम प्रदर्शन से बनी हैं। NDA ने राज्य से 8 मंत्रियों को पद की शपथ की दिलाया। जिसमें राज्य की जातीय समीकरण को साधने की पूरी कोशिश की गई। हालांकि जानकार बताते हैं कि बीजेपी का यह प्रयास संतुलित नहीं दिखता हैं। राज्य में इस बार जिन 8 मंत्रियों को शपथ दिलाया गया हैं, उसमें गिरिराज सिंह (भूमिहार),नित्यानंद राय (यादव), राज भूषण निषाद (मल्लाह ), सतीश चंद्र दुबे (ब्राह्मण), ललन सिंह (भूमिहार), रामनाथ ठाकुर (नाई), चिराग पासवान (दलित), और जीतन राम मांझी (दलित) शामिल हैं। यानि की राज्य से दो भूमिहार, दो दलित और यादव, नाई, मल्लाह जाती से 1-1 मंत्री बनाए गए हैं। अब जातीय संतुलन को देखें तो एनडीए के इस लिस्ट में राजपूतों समुदाय से एक भी मंत्री इस सूची में नहीं है। जबकी इससे पहले इस समुदाय से एक मंत्री बनाए गए थे। एनडीए के इस लिस्ट में बिहार की सियासत में अहमियत रखने वाली कुशवाहा और कुर्मी समाज को भी जगह नहीं मिली है। राज्य में बीजेपी की कोर वोटर मानी जाने वाली सवर्ण समुदाय को मंत्रीपरिषद में स्थान मिला है, वहीं अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए एनडीए ने यादव, अति पिछड़ा समुदाय से आने वाले नेताओं को मंत्रीपरिषद में जगह दे, लोकसभा चुनाव में वोटों के मायनों से सबसे बड़ी पार्टी आरजेडी की वोट बैंक को साधने की पूरी कोशिश की हैं। हालांकि एक-दो और मंत्री के मोदी मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने की संभावना अभी है।