संपादकीय डेस्क। लोकसभा चुनाव से पहले ” पार्टी और सरकार में सब कुछ ठीक है ” वाली बीजेपी के लिए अब ” सब कुछ ठीक नहीं है ” वाली परिस्थिति हो गई हैं। विपक्ष के साथ साथ पार्टी के नेता भी पार्टी इस अंदरूनी आग को हवा दे रहें हैं। मीडिया में बयानों से लेकर social media पोस्ट और टैग संकेत कर रहें हैं कि प्रदेश में पार्टी के भीतर कुछ तो चल रहा है। लेकिन क्या चल रहा है ? और क्या गड़बड़ है इसकी ठीक ठीक जानकारी सभी के पास नहीं हैं। लोकसभा चुनाव में 80 सीटें जीतने का दंभ भर रही पार्टी को मनवांछित सफलता नहीं मिली। पार्टी को सिर्फ 33 सीटों से संतोष करना पड़ा। जिसके बाद शुरू कयासों का दौर,अटकलों का दौर और की जाने लगी भविष्यवाणी, जो कितना सटीक है और अफवाह या हकीकत इसमें कितनी सच्चाई है यह वक्त के फैसले पर छोड़ देते है। उससे पहले पिछले घटनाक्रम पर एक नजर डालते हैं।
Lok Sabha Elections में 400 पार और प्रदेश में 80 सीटों पर सफलता की जयघोष कर रही भाजपा के लिए यह चुनाव मनमुताबिक नहीं रही। 2014 और 2019 में अपने दम पर बहुमत हासिल करने वाली बीजेपी को एक बार फिर अपने सहयोगियों के भाग्य पर निर्भर होना पड़ा। चुनाव में बीजेपी महज 240 सीटें ही जीत पाई। इस बड़े घाव को गहरा जख्म देने का काम किया उत्तरप्रदेश ने। प्रदेश लोकसभा में सीटों के मायनो में सबसे बड़ा राज्य है। प्रदेश के 80 सीटों पर बीजेपी को 2019 और 2014 की तुलना में क्रमश 29 और 38 सीटों का नुकसान हुआ है। पार्टी अगर अपना पिछला प्रदर्शन दोहरा लेती तो लोकसभा में उसकी सहयोगियों पर निर्भरता खत्म हो सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। प्रदेश में पार्टी के इस प्रदर्शन पर घमासान मच गया और संगठन एवं सरकार के नाम पर पार्टी में वैचारिक मतभेद देखने को मिली। लोकसभा के नतीजों और नई सरकार के गठन में व्यस्त बीजेपी ने लगभग 1 महीने से अधिक समय बाद जब नतीजों को लेकर लखनऊ में पार्टी कार्य समिति की बैठक आयोजित की तो उस दौरान यह वैचारिक मतभेद खुल कर समाने आए। सार्वजनिक तौर पर शासन और प्रशासन के बीच टकराव की खबरें भी आई। ज्ञात हो की पार्टी के बीच प्रदेश में इस तरह की चीजें पहले भी हुई है। मगर खबरों की सुर्खियों को इतना मजबूत आधार नहीं मिला है।
14 जुलाई को लखनऊ में राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के भीमराव अंबेडकर सभागार में भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक को संबोधित करते हुए आदित्यनाथ ने कहा, ” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में हमने विपक्ष पर लगातार दबाव बनाए रखा और उत्तर प्रदेश में वांछित सफलता हासिल की, चाहे वह 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव हो या 2017 और 2022 का विधानसभा चुनाव। भाजपा 2024 में पिछले चुनावों के बराबर वोट प्रतिशत हासिल करने में सफल रही। हालांकि, वोटों के बदलाव और अति आत्मविश्वास ने हमारी उम्मीदों को चोट पहुंचाई। नतीजतन, पिछले चुनावों में खत्म हो चुका विपक्ष आज छाती ठोकने में सक्षम है।” मुख्यमंत्री के इस बयान पर हमला करते हुए प्रदेश में उप मुख्यमंत्री और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने कहा संगठन सरकार से बड़ा है… संगठन से बड़ा कोई नहीं होता है! हर एक कार्यकर्ता हमारा गौरव है। दोनों नेताओं के इस बयान के बाद राज्य में पार्टी के भीतर की मतभेदों का उजागर होने लगा जिसे सत्ता रूढ पार्टी और विपक्ष ने अपनी जरूरत के हिसाब से मोड़ दी।
प्रदेश के दोनों शीर्ष नेताओं के बयानों के बाद राज्य में पार्टी की राजनीति एक बार फिर करवट बदलने लगी है। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य लखनऊ से दिल्ली की यात्रा पर निकल चले। इस मुख्यमंत्री ने अपने कैबिनेट की बैठक बुलाई और फिर राज्यपाल से भी मुलाकात की। प्रदेश की ये हलचल राजनीतिक बदलाव को हवा देने के लिए लिए पर्याप्त था। ऐसे में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र चौधरी का भाजपा के शीर्ष नेताओं से मुलाकात करना अंदेशों पर मुहर लगाने भर का काम था। लेकिन संभावनाओं को मजबूत होने का समय मिल गया। जब प्रदेश में यह घटना घट रही थी पार्टी प्रदेश अध्यक्ष लोकसभा में हार के बाद करीब 40000 कार्यकर्ताओं के फीडबैक के आधार पर 15 पन्नों की रिपोर्ट् पार्टी नेतृत्व को सौंपने गए थे। लेकिन राजनीति में सिर्फ दिखने जितना सच कहां होता है। जब प्रदेश अध्यक्ष दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व ने मुलाकात कर रहे थे। ठीक उसी समय प्रदेश के उप मुख्यमंत्री भी कतार में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। लेकिन उनका इंतजार खत्म नहीं हुआ।
प्रदेश में जिस सरकार और संगठन में वर्चस्व की लड़ाई हो रही है। उसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ की सरकार आगे दिख रही है। क्योंकि एक तरफ संगठन के वर्चस्व की बात करने वाले उपमुख्यमंत्री को इंतजार के सिवाय कुछ नहीं मिला वहीं योगी आदित्यनाथ अपने नये मिशन में पूरी सक्रियता से जुट गये हैं। प्रदेश विधानसभा में खाली 10 सीटों पर अगस्त में उपचुनाव होने हैं। जिसके लिए मुख्यमंत्री ने नई टीम बनाकर सभी की जिम्मेदारी तय कर दी। इस नए लिस्ट में हैरान करने वाली बात यह है कि पार्टी के दिग्गज नेता और दोनों उपमुख्यमंत्रियों को जगह नहीं मिली। कुल मिलकार कहें तो प्रदेश की राजनीति में कुछ पक तो रहा है, जिसके स्वाद के लिए अभी इंतजार लंबा चल सकता हैं।