पहले ही हो जाता है नागा साधुओं का पिंडदान, नहीं दी जाती मुखाग्नि फिर कैसे होता है अंतिम संस्कार ?

पटना। प्रयागराज के महाकुंभ 2025 में आस्था का विशाल मेला शुरू हो चुका है. प्रतिदिन करोड़ों श्रद्धालु संगम में डुबकी लगाकर पुण्य लाभ कमा रहे हैं. पहले दिन अखाड़ों ने अमृत स्नान किया, जिसके बाद साधु-संतों और आम जन ने संगम में पवित्र स्नान किया. महाकुंभ में नागा साधुओं (Naga sadhus )की भव्य उपस्थिति आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. उनकी पेशवाई और पवित्र स्नान का आयोजन श्रद्धालुओं के लिए एक अनूठा अनुभव बना रहा है.

Naga sadhus की समाधि परंपरा का रहस्य

नागा साधु (Naga sadhus )अपने जीवनकाल में ही पिंडदान और अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कर लेते हैं. उनके निधन के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया आम लोगों से बिल्कुल भिन्न होती है. जूना अखाड़ा के कोतवाल अखंडानंद महाराज ने बताया कि नागा साधुओं को मृत्यु के बाद भू-समाधि या जल-समाधि दी जाती है. दाह संस्कार न करने की परंपरा का पालन इसलिए किया जाता है क्योंकि नागा साधु अपने जीवनकाल में ही अपनी आत्मा और शरीर को परमात्मा को अर्पित कर चुके होते हैं.

भू-समाधि और जल-समाधि की परंपरा

पहले नागा साधुओं(Naga sadhus ) को जल-समाधि दी जाती थी, लेकिन अब पर्यावरण संरक्षण और नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए भू-समाधि का प्रचलन बढ़ गया है. भू-समाधि के दौरान नागा साधु के शरीर को स्नान कराने के बाद भगवा वस्त्र पहनाया जाता है. भस्म का लेप, गंगाजल, और तुलसी पत्तियों के साथ उन्हें सिद्ध योग मुद्रा में बैठाकर मिट्टी से ढक दिया जाता है. इस प्रक्रिया के बाद उस स्थल पर एक धार्मिक निशान बनाया जाता है.

धर्म और परंपरा का पालन

नागा साधुओं के अंतिम संस्कार में उनकी इच्छाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है. अगर कोई साधु जल-समाधि की इच्छा प्रकट करता है, तो उसे किसी पवित्र नदी में समर्पित किया जाता है. नागा परंपरा के अनुसार, उनका शरीर पंचमहाभूत—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से मिलकर बना है और मृत्यु के बाद इन तत्वों में ही विलीन हो जाना चाहिए.

नागा साधुओं (Naga sadhus ) को धर्म का रक्षक और आध्यात्मिक योद्धा माना जाता है. इसलिए उनके अंतिम संस्कार में परंपराओं का विशेष ध्यान रखा जाता है. यह न केवल उनकी साधना का प्रतीक है, बल्कि सनातन धर्म के मूल्यों को भी संरक्षित करता है. महाकुंभ में नागा साधुओं की परंपराएं और साधना श्रद्धालुओं को धर्म और अध्यात्म की गहराइयों से परिचित करा रही हैं. उनके अंतिम संस्कार की विधियां भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा की गहनता को दर्शाती हैं.

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