विपक्ष का प्रहार या संगठन का पलटवार, आम चुनाव में कहाँ मात खा गयी बीजेपी ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार देश के पीएम पद की शपथ लेने वाले दूसरे राजनेता बने। उन से पहले देश के प्रथम प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता जवाहर लाल नेहरू ने ऐसा किया था। भले ही पीएम मोदी ने तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली हो लेकिन उनके तीसरे कार्यकाल में देश में एक बार फिर से गठबंधन की सरकार लौट आई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि 2014 और 2019 में अपने दम पर लोकसभा के कुल 543 सीटों में क्रमशः 282 सीटें और 303 सीटें जीत संसद के निचले सदन में बहुमत पाई। लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 में पार्टी के लिए 370 और गठबंधन के लिए 400 पार सीटें जीतने की उम्मीदों पर पानी फिर गया और बीजेपी को अकेले के दम पर महज 240 सीटों के साथ संतोष करना पड़ा।

पहले 2 कार्यकाल में बहुमत वाली बीजेपी तीसरे में सहयोगियों पर निर्भर

एनडीए सरकार के पहले 2 कार्यकाल में बहुमत के कारण अपने हिसाब से शासन में अपनी मनमानी करने वाली बीजेपी के लिए 2024 के चुनाव नतीजों के बाद पहली चुनौती सरकार बचाने की थी। ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसी अटकलें लगाई जाने लगी की गठबंधन की मुख्य सहयोगी तेलुगू देशम पार्टी (TDP)और जनता दल यूनाइटेड (JDU) द्वारा अपनी महत्वाकांक्षा के कारण पाला बदलने की संभावना है। जैसा कि दोनों पहले भी कई बार कर चुकी हैं। लेकिन ऐसी अटकलें खबरों की गुमनाम सूत्रों की भांति अभी तक अफवाह ही हैं। अपने उम्मीदों के हिसाब से प्रदर्शन नहीं कर पाने वाली बीजेपी को हिन्दी पट्टी राज्यों में सीटों का नुकसान हुआ, जिससे पार्टी बहुमत से 32 सीटें पीछे रह गई। इन राज्यों में अपने पिछले प्रदर्शन से उत्साहित बीजेपी ने 370 का लक्ष्य निर्धारित किया था लेकिन इन्हीं राज्यों में कमजोर प्रदर्शन के चलते बीजेपी बहुमत से दूर और अपने सहयोगियों पर निर्भर हो गई।

मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी ( फाइल फोटो- इंडिया टुडे )

मजबूत जनाधार के बाद भी कमजोर जनादेश 

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर एनडीए की सरकार बनी है लेकिन नतीजों के बाद से हुए फैसलों में प्रभुत्व बीजेपी का ही दिख रहा है। इसके बावजूद लोकसभा में पार्टी का प्रदर्शन राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय हैं। चर्चे हैं कि असल मायनों में यह बीजेपी की हार है ? यह हार बीजेपी की विचारधारा की है ? पार्टी के नेताओं की अहंकार की है ? विपक्ष से लेकर खुद पार्टी के अपने नेता, कार्यकर्ता और यहाँ तक पार्टी की समानांतर विचारधरा रखने वाली संगठन आरएसएस भी पार्टी के प्रदर्शन को उसका अहंकार के नतीजा बता रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि पिछले एक दशक के कई लोकसभा और विधानसभा चुनाव में सबसे मजबूत जनादेश हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी का जनाधार इतना कमजोर कैसे हुआ, क्या यह देश में मजबूत विपक्ष का एक संकेत है, या फिर पार्टी की कार्यशैली के प्रति आम जनमानस की नाराजगी ? कई संकेत तो ऐसे भी है जिससे यह सिद्ध होता है कि यह नाराजगी सिर्फ जनमानस की नहीं है बल्कि पार्टी के कार्यकर्ता और बीजेपी की सबसे बड़ी वैचारिक संगठन आरएसएस की  भी नाराजगी झलकती है। जो बताता है कि पार्टी ने अपने किले को छोड़ दूसरे के घरों की पहरेदारी में लगी रही।

राजनीति में संघ की  कितनी भूमिका ? 

किसी राज नेता या फिर राजनीतिक दल की राजनीतिक सफलता उसकी जमीनी आधार तय करता है। जिसे खुद राजनेता और राजनीतिक पार्टियां निर्धारित नहीं करती है, बल्कि उसे तैयार करके दी जाती है। जिसे तैयार करने का काम उसके समानांतर विचार रखने वाली संगठन का होता है। आसान भाषा में कहें तो पार्टियां एक बॉडी की तरह होती है जिसकी उपयोगिता उसका ब्रेन यानि की संगठन तय करता हैं। जैसा आदेश या निर्देश ब्रेन बॉडी को देती है बॉडी वैसा वैसा करती है। क्रिकेट के भाषा में समझें तो पार्टी का काम सिर्फ बैटिंग करने तक सीमित होता है। फील्डिंग करना, बॉलिंग करना, और पिच तैयार करना आदि सभी काम उसके संगठन का होता है। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बीच ऐसा ही रिश्ता है। जहां आरएसएस फील्डिंग करती है, मुद्दे सेट करता है, लक्ष्य निर्धारित करता है, जिसे पूरा करने का काम बीजेपी करती है। एक दूसरे को सपोर्ट करने तथा पार्टी और संगठन के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए विंग काम करती है। आसान भाषा में कहें तो दोनों एक दूसरे के पूरक है और एक दूसरे के बिना कुछ नहीं हैं। जिस दिन आरएसएस का प्रभुत्व कम हो जाएगा उस दिन बीजेपी खत्म हो जाएगी। क्योंकि ऐसे कई उदाहरण है जहां संगठन के कमजोर होने से पार्टियां बिखरती चली गई। कांग्रेस की समानांतर वैचारिक संगठन ” सेवा दल ” के प्रभुत्व कम होने का नतीजा हुआ कि एक दौर में अपने दम पर 400 का आंकड़ा पार करने वाली कांग्रेस, पिछले दो लोकसभा में सदन में एक नेता प्रतिपक्ष तक नहीं बना सकी। 90 के दशक के शुरुआती दिनों से लेकर 21 सदी के पहले दशक तक उत्तरप्रदेश और केंद्र में सरकार की गठजोड़ में शामिल और अपने दम पर राज्य में सरकार बनाने वाली पार्टी बहुजन समाज पार्टी की समानांतर वैचारिक संगठन BS-4 के प्रभुत्व खत्म होने से पार्टी की स्थित कमजोर हो गई , समाजवादी पार्टी की समानांतर वैचारिक संगठन “लोहिया वाहनी “ के कमजोर होने का नतीजा आप देख ही सकते हैं आदि ऐसे और भी कई उदाहरण है।

ये मतभेद है या मनभेद ?

ऐसे में आम चुनाव के दौरान बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा का बयान और फिर चुनाव के नतीजों के बाद नए NDA सरकार की गठन के बाद पिछले 3 तीनों दिनों RSS की तरफ से दिए गए 3 बयान के मायने क्या है ? संघ और पार्टी के बीच के रिश्तों में आई इस दरार के संकेत क्या हैं ? ऐसे कई सवालों के जवाब पिछले कई चुनाव के परिणामों में ढूंढा जा सकता हैं। 2014 के चुनाव में संघ की सक्रियता के बदौलत कांग्रेस के बाद बीजेपी आम चुनाव में बहुमत लाने वाली पार्टी बनी। 2019 के चुनाव में पार्टी पहली बार अपने दम पर 300 का आंकड़ा छुआ। 2017 और 2022 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया। लेकिन कुछ ऐसे भी नतीजें हैं जहां संघ की सक्रियता में कमी के कारण पार्टी को औंधे मुंह गिरना भी पड़ा। ऐसे में आप यह भी कह सकते है कि संघ के बिना बीजेपी कुछ नहीं है, लेकिन ये सिर्फ एक पहलू तक सीमित रहने वाला भी नहीं। जानकार बताते है चुनाव से पहले संघ जब अपना सर्वे कराता है तो नतीजों का अंदेशा उसे पहले से रहती है और फिर चुनाव में उसी अंदेशे के आधार पर संगठन अपनी भागीदारी भी सुनश्चित करती है। 2009 और 2004 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद भी ऐसी अफवाहों ने खबरों की सुर्खियां बटोरी थी। ऐसे में क्या संगठन सिर्फ क्रेडिट लेने तक बीजेपी की वैचारिक सहयोगी है ? या फिर माजरा कुछ और है?

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