UNSECO world heritage in Bihar : भारत जहां 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेशों की विविध में एकता बसती है, अपनी अनूठी सांस्कृतिक धरोहर के लिए विश्वभर में जाना जाता हैं. UNESCO की विश्व धरोहर सूची में भारत के 44 स्थान शामिल है. जिनमें 36 सांस्कृतिक, 7 प्राकृतिक और एक मिश्रित स्थल है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस गौरवशाली सूची में बिहार के कितने स्थल दर्ज हैं?
कहा से शुरू हुई ज्ञान की यात्रा?
बिहार केवल एक राज्य ही नहीं है बल्कि वह पावन धारा है जहां गौतम बुद्ध और भगवान महावीर ने धर्म के नए आयाम स्थापित किए है. इसे बुद्ध की भूमि, ज्ञान की भूमि, गौरव की भूमि अनेक नामों से पुकारा जाता है, और हर नाम इसके गौरवशाली अतीत का गवाह है. यह वही भूमि है जहां महान गणितज्ञ आर्यभट्ट ने खगोल विज्ञान के नए सिद्धांत दिए, जहां भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जन्म लिया, और जहां आर्यभट्ट तथा अर्थशास्त्र जैसे महान ग्रंथों की रचना हुई. मगध साम्राज्य से लेकर आज के आधुनिक बिहार तक, यह क्षेत्र इतिहास के हर मोड़ पर महत्वपूर्ण रहा है.
कौन-सी है बिहार की दो अनमोल धरोहर
1. महाबोधि मंदिर
बोधगया में स्थित महाबोधि मंदिर परिसर को 2002 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर का दर्जा दिया गया था. तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में महान मौर्य सम्राट अशोक द्वारा स्थापित यह परिसर बौद्ध धर्म के चार सबसे पवित्र स्थलों में से एक है. यही वह पवित्र भूमि है जहां राजकुमार सिद्धार्थ ने बोधिवृक्ष के नीचे ध्यान लगाकर ज्ञान प्राप्त किया और गौतम बुद्ध बने, इस जगह पर तीन प्रमुख स्थान है पहले पवित्र बौद्धिक जिसने से बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, दूसरा वज्रासन जहां उन्होंने ज्ञान प्राप्ति के बाद ध्यान किया था और तीसरा मृणाल कुंड जो बुद्ध के साथ सप्ताह की साधना से जुड़ा हुआ है.
2. नालंदा विश्वविद्यालय
नालंदा विश्वविद्यालय की पुरातात्विक अवशेषों को 2016 में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया. पूरे 1600 वर्षो तक यह विश्वविद्यालय ज्ञान का सबसे बड़ा केंद्र था. यहां के अवशेषों में विशाल मठ, स्तूप, मंदिर, विहार और प्लास्टर पत्थर तथा धातु से निर्मित अद्भुत कलाकृतियां देखी जा सकती हैं. नालंदा भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे प्राचीन और व्यवस्थित विश्वविद्यालय था 800 वर्षो तक निर्बाध रूप से यहां शिक्षा और शोध का कार्य चलता रहा. यह स्थल बताता है कि कैसे बौद्ध धर्म ने एक धार्मिक आंदोलन से आगे बढ़कर मठवासी और शैक्षणिक परंपराओं में उत्कर्ष प्राप्त किया.
बिहार की ये दोनों धरोहरें सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि मानवता की बौद्धिक और आध्यात्मिक यात्रा के जीवंत प्रमाण हैं.