आज सुबह दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट के टर्मिनल 1 पर छत का ऊपरी हिस्सा भारी बारिश के कारण गिर गया, जिसके चलते वहाँ गाड़ियां चपेट में आ गईं और मौके पर एक कैब ड्राइवर की मौत हो गई। छत का वो हिस्सा सीधे उसके कार पर जा गिरी जिससे मौके पर ही उसकी उसकी मौत हो गई। ये तस्वीर उसी हादसे की है अब इस तस्वीर को देखिए….और सिर्फ सोचिए ये व्यक्ति जो हादसे का शिकार हुआ हैं, आपसे क्या रिश्ता रखता है ? मन में उत्पन्न कई असीमित विचारों के बीच यह आपको महज आम इंसान नजर आएगा। लेकिन यह आम नहीं हैं। यह उस देश का नागरिक हैं जिसे अपने होने की अतीत के दंत कथाओं पर वर्तमान का झूठा भरोसा परोसा जा रहा है कि हम एक दिन विश्व गुरु होंगे। क्या किसी देश का विश्व गुरु हो जाना भर ही उसके लिए पर्याप्त है ? क्या मानवता और सामाजिकता जैसी चीजें सिर्फ और सिर्फ किताबों में छापने की बातें हैं या फिर रात के अंधेरे में जब नींद आँखों में ना आए, उस वक्त कहानियों के जरिए एक अबोध बालक से रूबरू होता वो काल्पनिक किरदार है ? जिसे उसकी एकाकी होने के लिए विवस किया जा रहा होता हैं। मुझे लगता है ऐसा नहीं है…..
यह आम इंसान हमारी आपकी तरह है जिसे जिंदगी ने जीना सिखाया। क्योंकि हम जिसे जिंदगी जीना मानते हैं वो महज सोशल मीडिया का ट्रेंड भर हैं। जहां सबकुछ एल्गोरिदम पर निर्भर रहता हैं। मगर जिंदगी महज एल्गोरिदम तो नहीं हो सकती हैं। इसकी परिभाषा एक आम इंसान की तरह ही आम हैं जिसे वो आम इंसान खुद निर्धारित करता है और फिर निर्णय लेता है। निर्णय का सही या गलत होने से क्या मतलब निर्णय तो निर्णय होता है। इसमें दिक्कत तब आती है जब किसी दूसरे का परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से इस निर्णय में हस्तक्षेप होता है। मगर विडंबना देखिए बिना किसी के हस्तक्षेप के इंसान, इंसान भी कहां रहता है। खैर मुद्दे से भटकने की यंहा कोई खास जरूरत नहीं है क्यों बात एक आम इंसान की है। जिसका खास होना उसके जिंदगी का एक मात्र मकसद होता है।
किसी राष्ट्र के विकास के जितने भी पहलू होते हैं उसमें सबसे महत्वपूर्ण है राजनीति। जिसका सकारात्मक होना बेहद जरूरी है। कम से कम सामाजिक न्याय और मानवता के लिए एक प्रभावी राजनीति का होना बेहद आवश्यक है ,जिसकी महत्वाकांक्षा सिर्फ राजनीति नहीं होना चाहिए। अगर मैं यह कहूँ हादसे की असली वजह हमारी -आपकी गंदी राजनीति हैं तो आप मुझसे शिकायत रख सकते हैं। क्योंकि आप सिर्फ इतना कर के अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर अपने मानव होने और सामाजिक होने का प्रमाण देंगे। लेकिन इतने से क्या ही होता हैं। सोशल मीडिया का एक ट्रेंड कितने ही समय का होता है ? क्योंकि इतनी बात तो आप भी जानते हैं कि यह सिर्फ आपकी -हमारी जिम्मेदारी का मसला नहीं है। सरकारी दफ्तर में धूल फांक रहें उन कागज के टुकरों से तो आप भी वाकिफ होंगे। जहां हम जैसे आम लोगों के टेक्स से रोज ना जाने कितनी फ़ाइलें एक जिल्द में समेट दी जाती है और फिर किसी दिन अचानक लगी आग से सबकुछ खाक हो जाता है। ताकि जरूरत के समय वो उपलब्ध ना रहें….
पिछले दिनों जितने भी हादसे हुए या करवाए गए उसका शिकार एक आम नागरिक हुआ। जिसका गुनाह सिर्फ आम नागरिक होना था। कभी पुल गिरने से, कभी रेल हादसे, कभी अस्पताल का छत गिर जाना, कभी प्रचार का होर्डिंग बोर्ड गिर जाना, ट्रेन में बैठे किसी यात्री के शरीर से सरिया का आर पार हो जाना या फिर मिडिल बर्थ का गिर जाना, कभी खराब सड़क के कारण रोड दुर्घटना, नकली दवा, पानी की खराब गुणवत्ता, रहने को घर की अनुपलब्धता, खाने की कमी तो कभी निर्माणाधीन मकान का गिर जाना आदि किसी फैक्ट्री में दुर्घटना के कारण हर दिन औसतन लगभग दर्जनों लोग हादसे का शिकार होते है। जो सरकार के लिए महज एक आंकड़ा है। जिस आँकड़े पर सरकार अपनी कुर्सी की मजबूती टटोलती है। जिसके कमजोर होने पर फिर अपनी जरूरत के हिसाब के बोली लगाती है। यह बोली होती है मक्कारी की, यह बोली होती फरेब की, यह बोली होती है भ्रस्टाचार की, यह बोली होती है झूठे भरोसे की, तो यह बोली होती है सरकार के नजर में एक आम इंसान की मजबूरी की। जिसकी कीमत लगा सरकार अपनी नाकामी छिपा लेती है। मगर किसी दूसरे की गलती में अपना सच ढूँढता वो आम इंसान वहीं रहता है।