मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को बसपा के राष्ट्रीय Coordinator और अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी पद से क्यों हटाया?

मंगलवार देर शाम करीब साढ़े 9 बजे के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्विटर पर एक पोस्ट किया।

 ” विदित है कि बीएसपी एक पार्टी के साथ ही बाबा साहेब डा भीमराव अम्बेडकर के आत्म-सम्मान व स्वाभिमान तथा सामाजिक परिवर्तन का भी मूवमेन्ट है जिसके लिए मान्य. श्री कांशीराम जी व मैंने खुद भी अपनी पूरी ज़िन्दगी समर्पित की है और इसे गति देने के लिए नई पीढ़ी को भी तैयार किया जा रहा है।इसी क्रम में पार्टी में, अन्य लोगों को आगे बढ़ाने के साथ ही, श्री आकाश आनन्द को नेशनल कोओर्डिनेटर व अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, किन्तु पार्टी व मूवमेन्ट के व्यापक हित में पूर्ण परिपक्वता (maturity) आने तक अभी उन्हें इन दोनों अहम जिम्मेदारियों से अलग किया जा रहा है।जबकि इनके पिता श्री आनन्द कुमार पार्टी व मूवमेन्ट में अपनी जिम्मेदारी पहले की तरह ही निभाते रहेंगे। अतः बीएसपी का नेतृत्व पार्टी व मूवमेन्ट के हित में एवं बाबा साहेब डा. अम्बेडकर के कारवाँ को आगे बढ़ाने में हर प्रकार का त्याग व कुर्बानी देने से पीछे नहीं हटने वाला है।”

जिसके बाद यह साफ हो गया कि बीएसपी नेता और मायावती के भतीजे आकाश आनंद अब पार्टी के राष्ट्रीय Coordinator और बसपा के राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं रहेंगे। जिसके बाद यह सवाल खूब उछलने लगा कि मायावती ने आखिर ये फैसला क्यों किया? आकाश नहीं तो कौन होगा मायावती का उत्तराधिकारी? लेकिन उससे पहले यह जानना जरूरी हैं कि आखिरी मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को बसपा के राष्ट्रीय Coordinator और अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी पद से क्यों हटाया?

कौन हैं आकाश आनंद ? 

उत्तराधिकारी से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर आकाश आनंद कौन हैं? क्या आनंद का परिचय सिर्फ मायावती के भतीजे जितना भर हैं? तो नहीं। 10 दिसंबर 2023 को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित होने वाले आकाश 7 साल पहले राजनीति में लॉन्च हुए थे। बसपा नेता और मायावती के छोटे भाई आनंद कुमार के बेटे आकाश आनंद की पढ़ाई दिल्ली में हुई, लेकिन उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने लंदन जाने का सोचा। जहां से एमबीए करने के बाद वो भारत लौट आए। आकाश पहली बार सुर्खियों का हिस्सा तब बने जब उनके दीदी मायावती ने राजनीति से रूबरू करवाने पहली बार सहारनपुर में 2017 के चुनावी मंच पर लाया था। जिसके बाद किस्से बनते रहे और आकाश राजनीति समझते रहे। पहले लॉन्च के करीब 2 साल बाद लोकसभा चुनाव 2019 में एक बार फिर सुर्खियां बनी ”आकाश आनंद बसपा में शामिल ” परिवारवाद के खिलाफ राजनीति करने वाली मायावती अपने भतीजे के साथ राजनीति में स्थान ढूंढने लगी।

पार्टी में बढ़ाया अपना कद

2017 और 2019 तक सिर्फ चुनावी सभा, रैलियाँ, मीटिंग, आदि में उपस्थित रहने के बाद भी जनता आकाश से परिचित नहीं थी। रणनीति बनाने और दीदी मायावती के साथ कदम मिलाकर चलना सीख रहें आकाश को अभी तक मंच नहीं मिला था। लेकिन 2019 के चुनावी समर में उनकी आधिकारिक लॉन्चिंग भी हो गई। जब चुनाव आयोग ने मायावती पर 48 घंटे के लिए चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी तो कमान पार्टी के स्टार प्रचारक लिस्ट में शामिल आकाश के हाथ आया। आगरा के उस रैली में लोगों को आकाश यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहें की वो बसपा के मायावती के तुरुप के इक्का है। फिर कारवां चलता रहा और आकाश का कद बढ़ता गया।

5 साल में बने बसपा के उत्तराधिकारी

पहले पार्टी में शामिल होना, फिर 2019 में लोकसभा चुनाव स्टार प्रचारक लिस्ट में स्थान, 2022 के विधानसभा चुनाव में स्टार प्रचारक लिस्ट में दूसरा स्थान, राजस्थान में करीब 14 किमी की लंबी पदयात्रा का नेतृत्व, 2023 में पाँच राज्यों के विधान सभा चुनाव में पार्टी का कमान आदि संकेत कर रहें थे कि आकाश ने मायावती के राजनीतिक इंटर्नशिप में काफी कुछ सीखा था। परिणाम साफ है कि 2019 के लोकसभा चुनाव से कुछ दिन पहले पार्टी में शामिल हुए आकाश को मायावती ने जून 2019 में हुए राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान मायावती ने उन्हें बसपा का राष्ट्रीय समन्वयक नियुक्त कर दिया और फिर उसके बाद महज 5 साल के भीतर ही 10 दिसंबर 2023 को मायावती ने आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। यह संकेत थे आकाश के राजनीतिक कद के ऊंचे होने की।

हटाए जाने के पीछे यह है वजह ?

एक तरफ जहां मायावती अपने भाषणों में सधी हुई भाषा का प्रयोग कर विपक्ष को घेरती है और सौम्य तरीके से आरोप लगाती है। ठीक उसके विपरीत आकाश अपने भाषण में सख्त तेवर के लिए लोकप्रिय हैं। जिससे मायावती खुश नहीं रहती हैं। पिछले दिनों एक चुनावी सभा में आकाश द्वारा उनके सरकार की आलोचना औरअन्य विपक्षी पार्टीयो के प्रति आक्रामक रुख और हिंसात्मक शब्दों के चयन के चलते पार्टी मे उनकी भूमिकाओं से अचानक बर्खास्त किए जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं। इसके अलावा मायावती के इस फैसले को उनकी रणनीति भी बताई जा रही हैं।

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