Gharonda: अगर त्यौहार हमारी संस्कृति की आत्मा है तो घरौंदा बिहार और झारखंड की उस आत्मा का सबसे कोमल रंगीन धागा है। दिवाली की रात पूरा देश धन की देवी लक्ष्मी कुबेर और गणेश जी का आवाहन करता है, तब बिहार झारखंड में घरौंदा के रूप में एक सुंदर भविष्य की नींव रखी जाती है, यह रस्म सिर्फ खिलौना या सजावट नहीं यह अविवाहित कन्याओं के सपने, रचनात्मकता और सुन्दर भविष्य के कामना की मूर्ति है।
मिट्टी के घर से थर्मोकोल के महल तक
दिवाली में बिहार और झारखंड के हर घर में छोटी बच्चियों के लिए दिल में एक ही खुशी होती है, इस बार मेरा घरौंदा कैसा बनेगा? यह घरौंदा सिर्फ एक छोटा सा खिलौना नहीं यह खुशियों की पहली सीढ़ी है, जहां हर कुंवारी बेटी अपने सपनों का घर बनाती है।
पर क्या आपको पता है इस घरौंदे ने कितना लंबा सफर तय किया है?
पुराने जमाने में घरौंदा बनाने का मतलब था मिट्टी से दोस्ती करना। हमारी दादियां और ननिया घर के आंगन की सौंधी मिट्टी से छोटे छोटे घर बनाती थी उस घरौंदे में मिट्टी की खुशबू जो आज भी याद दिलाती है सादगी और अपनेपन की। धीरे-धीरे जब बाजार का चलन बढ़ा तो कुछ लोग लकड़ी के छोटे डिब्बे या सांचे से भी घर आंधी बनाने लगे मिट्टी के घर से थोड़ा मजबूत हो गया था। और जो आज के दौर में सबसे ज्यादा चलन थर्माकोल का है। इतना हल्का होता है कि बच्चे भी से उठाकर कहीं भी रख सकते हैं। अप तो क्रिएटिविटी की कोई हद नहीं है आज की लड़कियां आइसक्रीम स्टिक से कार्डबोर्ड से और यहां तक की घर की पुरानी सामानों को रिसाइकल करके भी अपना घरौंदा बना रही है।
क्या होता है कुलहिया और चुकिया?
कुलहिया और चुकिया मिट्टी के छोटे-छोटे बर्तन होते हैं, जो बच्चों के खिलौने वाले रसोई सेट का हिस्सा होते हैं, लेकिन दिवाली पर इनका महत्व धार्मिक और सांस्कृतिक होता है।
कुलहिया मिट्टी का बना एक छोटा घड़ा, कलश होता है।यह घर में अनाज और जल की बरकत का प्रतीक है। चुकिया मिट्टी की बनी एक छोटी हांडी या छोटी देगची होती है। यह मां अन्नपूर्णा और घर-गृहस्थी चलाने की कुशलता का प्रतीक है।
दिवाली के दिन क्यों भरा जाता है कुलहिया और चुकिया?
कुलहिया और चुकिया को भरने का उद्देश्य एक ही है, भविष्य के गृहस्थी जीवन के लिए शुभ शगुन और कामनाएं। बरकत और सम्पन्नता के लिए कुलहिया भरा जाता है। कुलहिया में साबुत अनाज जैसे धान की लाई ओर सिक्के भरे जाते हैं। जिससे यह कामना की जाती है कि जिस तरह कुलहिया अनाज से भरा हुआ है उसी तरह घरौंदा बनाने वाली लड़की का भविष्य का घर भी धन धान्य और अन्न से कभी खाली न हो।
कुशलता और अन्नपूर्णा के लिए चुकिया भरा जाता है। चुकिया में बताशे भरकर रखते है। इसे भरकर यह माना जाता है कि लड़की जब अपने ससुराल जाएगी, तो उस घर में कभी अन्न की कमी नहीं होगी और जीवन मे प्रेम और मिठास बना रहेगा।
घरौंदे के पास या अन्दर कुलहिया और चुकिया के साथ गुड़िया और गुड्डा भी रखते है, ताकि यह सब मिलकर घरौंदा को आबाद बना सके। यह परंपरा अविवाहित लड़की की सुंदर ओर भरे पूरे गृहस्थ जीवन की कामना के लिए किया जाता है।
मिट्टी में बसा इस संस्कृति सपनों में बुनी परंपरा
बिहार झारखंड की सांस्कृतिक विरासत का यह अनमोल हिस्सा है। जो पीढ़ियों से बेटियों के सपने को संजोता आ रहा है। जहां देश भर में दिवाली धन समृद्धि का पर्व है, वही यहां यह त्यौहार कुंवारी कन्याओं के लिए अपने भविष्य के घर को सजाने संवारने का पहला पाठ है। मिट्टी के घर से लेकर थर्माकोल के महल तक घरौंदे ने समय के साथ अपना रूप जरूर बदला है, लेकिन इसकी आत्मा आज भी वही है। आज जब आधुनिकता की चमक में कई परंपराएं धुंधली पड़ रही है, तब घरौंदे की यह प्रथा हमें याद दिलाती है, कि हमारी संस्कृति कितनी संवेदनशील और गहरी है। यह सिर्फ खिलौने का घर नहीं बल्कि बचपन की मासूमियत जवानी के सपने और बुढ़ापे की यादों का संगम है।
घरौंदा सिर्फ एक परंपरा नहीं या बिहार झारखंड की बेटियों के सपनों का पहला पड़ाव है। जहां मिट्टी में मिठास घोलकर बनाया जाता है, एक खूबसूरत कल का सपना ।