Bihar EPIC numbers controversy : बिहार की राजनीति इन दिनों एक बेहद ही दिलचस्प और चिंताजनक मोड़ पर खड़ी है। चुनाव आयोग द्वारा राज्य में कराए गए SIR का ड्राफ्ट लिस्ट जारी होने के बाद भले ही किसी भी राजनीतिक दल ने अधिकारिक तौर पर आपत्ती नहीं जताई हो लेकिन इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष रोज एक दूसरे को घेर रही है.
बीते दिनों जब उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के नाम पर दो-दो EPIC नंबर सामने आए तो अचानक एक बड़ा नैरेटिव गढ़ने की होड़ लग गई और यह तय किया जाने लगा कि यह एक जानबूझकर किया गया फर्जीवाड़ा है या फिर मतदाता सूची की एक सामान्य सी त्रुटि।

हालांकि दो-दो EPIC नंबर वाले इस द्वंद्व में सिर्फ तेजस्वी यादव नहीं थे.कुछ लोगों ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके घरों में भी किसी न किसी सदस्य के पास दो-दो वोटर कार्ड हैं.
देखा जाए तो जमीनी तौर पर यह मामला एक प्रशासनिक भूल या फिर लापहरवाही हो सकता है, जिसे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी प्रक्रिया से ठीक किया जा सकता है। लेकिन जब खुद राज्य के उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा सामने आकर इसे जानबूझकर किया गया फर्जीवाड़ा करार देते हैं,तो मामला राजनीतिक रंग ले लेता है। और फिर जवाब में तेजस्वी यादव विजय सिन्हा के नाम पर भी दो-दो EPIC कार्ड होने के प्रमाण सामने रखते हैं जिनमें न केवल अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों का उल्लेख है,बल्कि दोनों में उनकी आयु तक भिन्न बताई गई है।
इस पर सवाल उठता है क्या यह त्रुटि है, एक प्रशासनिक लापरवाही है, या फिर वोटर लिस्ट में छेड़छाड़ जैसा गंभीर मामला? यदि चुनाव आयोग की प्रणाली इतनी त्रुटिपूर्ण है कि एक ही व्यक्ति के नाम पर दो जगह वोटर कार्ड बन जाएं, तो पुनरीक्षण प्रक्रियाएं वास्तव में कितनी कारगर हैं? तेजस्वी यादव का सवाल भी अहम है यदि किसी व्यक्ति के दो अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में EPIC कार्ड बने हैं, और उसने दोनों जगह खुद साइन नहीं किया है, तो क्या यह मान लिया जाए कि चुनाव आयोग की प्रणाली में किसी ने फर्जी हस्ताक्षर किए हैं? यह सिर्फ एक व्यक्ति का सवाल नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है।
इस पूरी बहस के बीच चुनाव आयोग का रवैया और भी अधिक चिंता बढ़ाने वाला है। सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हलफनामे में आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह बिहार में जिन 65 लाख मतदाताओं को वोटर लिस्ट से बाहर किया गया है, उनकी न तो सूची साझा करेगा और न ही कारण बताएगा। क्या यह रवैया लोकतंत्र में पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों की अवधारणा के विपरीत नहीं है?
जब किसी नागरिक का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया जाता है, तो यह केवल एक आंकड़ा नहीं मिटता ,यह उसके मताधिकार को सीधा प्रभावित करता है, जो भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त एक मौलिक अधिकार है। आयोग का यह कहना कि वह कारण बताने के लिए बाध्य नहीं है, एक ऐसी प्रवृत्ति को जन्म देता है जिसमें सत्ता और प्रणाली, आम नागरिक के ऊपर खड़ी हो जाती है।
आज आवश्यकता है कि इस पूरे प्रकरण को केवल एक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित न रखकर, व्यापक लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए। मतदाता सूची की पवित्रता केवल एक तकनीकी मामला नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आधारशिला है। चाहे वह तेजस्वी यादव हों या विजय सिन्हा जब नाम दो जगह दर्ज हों, हस्ताक्षर संदिग्ध हों, और उम्र तक अलग बताई गई हो तब सवाल जरूरी हो जाता है कि गलती किसकी है और जवाबदेही किसकी बनती है?
चुनाव आयोग को चाहिए कि वह ना केवल अपनी प्रक्रियाओं को और अधिक पारदर्शी बनाए, बल्कि नागरिकों को यह भरोसा भी दे कि उनके अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। वरना, यह संकट सिर्फ 65 लाख मतदाताओं का नहीं, पूरे लोकतंत्र की विश्वसनीयता का बन जाएगा।