कुत्तों से अराजकता फैलती है…कहीं प्रभावित तो नहीं हो रही हमारी सामाजिक संरचना ?

Stray Dog : दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों की समस्या ने आखिरकार सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकर्षित किया है, जिसके बाद अदालत ने दिल्ली और एनसीआर की सरकारों को निर्देश दिया कि वे आठ सप्ताह के भीतर सड़कों पर घूम रहे लावारिस कुत्तों को शेल्टर होम्स में भेजें. यह आदेश एक गंभीर समस्या की ओर इशारा करता है, जो न केवल जानलेवा बीमारी रेबीज़, बल्कि मानव-संप्रेषणीय बीमारियों, जैसे डॉग बाइट की बढ़ती घटनाओं को लेकर भी चिंताएं पैदा कर रहा है. हालांकि, इस फैसले को लेकर समाज में दो धड़े बन गए हैं, और इस मुद्दे का समाधान पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है.

कोर्ट ने इस मामले पर 28 जुलाई को स्वतः संज्ञान लिया था, जब उसने दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में डॉग बाइट की बढ़ती घटनाओं और इससे जुड़ी मौतों के आंकड़े देखे. अकेले 2024 में भारत में 37 लाख से अधिक डॉग बाइट की घटनाएं सामने आईं, जिनमें से 5.19 लाख से अधिक पीड़ित 15 साल से कम उम्र के बच्चे थे. दिल्ली में रेबीज़ के कारण 54 संदिग्ध मौतें हुईं, जो पिछले साल की तुलना में कहीं अधिक हैं.दिल्ली में हर दिन औसतन 2,000 डॉग बाइट की घटनाएं हो रही हैं, और सिर्फ 2024 के पहले छह महीनों में 35,198 बाइट के मामले दर्ज किए गए हैं. यदि यह आंकड़े ध्यान से देखें, तो यह समस्या गंभीर और नियंत्रण से बाहर होती जा रही है, जो कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है.

सरकार ने 2023 में पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियम लागू किया था, जिसका उद्देश्य आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करना और उन्हें टीकाकरण तथा नसबंदी के जरिए रेबीज़ जैसी जानलेवा बीमारियों से बचाना था. लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली में केवल 10 लाख आवारा कुत्तों में से आधे से भी कम की नसबंदी की जा सकी है, जिससे समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पाया.इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने ABC नियम 2023 को ‘बेतुका’ करार दिया है, और कुत्तों को शेल्टर होम्स में भेजने का आदेश दिया है. यह सवाल उठता है कि क्या यह कदम समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है, या फिर यह महज एक अस्थायी उपाय है?

कोर्ट के फैसले को लेकर समाज में दो मुख्य धाराएं बन गई हैं. एक ओर पशु प्रेमी संगठन और जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले समूह इसे एक गलत निर्णय मानते हैं. उनका मानना है कि आवारा कुत्तों को शेल्टर होम्स में भेजने से उनकी जीवन गुणवत्ता प्रभावित होगी, और यह कदम समस्या का दीर्घकालिक समाधान नहीं है. दूसरी ओर, नागरिक समाज का एक हिस्सा इस फैसले को जनता के स्वास्थ्य और सुरक्षा के मद्देनजर जरूरी मानता है.

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इसे एक राहत देने वाला कदम बताया है और सरकार के ईमानदार प्रयासों का भरोसा दिलाया है. हालांकि, दिल्ली के मेयर इक़बाल सिंह ने यह भी कहा कि नगर निगम के पास शेल्टर होम्स की कमी है और इसे बढ़ाने की जरूरत है.भारत की ही तरह, दुनिया के कई अन्य देशों में भी आवारा कुत्तों और रेबीज़ जैसी बीमारियों से निपटने के लिए उपाय अपनाए जा रहे हैं. न्यूयॉर्क जैसी जगहों पर एनिमल केयर सेंटर्स आवारा कुत्तों को शेल्टर होम्स में भेजते हैं, जहां उनके लिए घर ढूंढ़े जाते हैं. अमेरिका में आवारा कुत्तों को क़ानूनी सुरक्षा प्राप्त है और उन्हें उपेक्षा या दुर्व्यवहार से बचाने के लिए कठोर नियम हैं. ब्रिटेन में भी स्थानीय प्रशासन आवारा कुत्तों का प्रबंधन करता है. वहां पर आवारा कुत्तों के लिए माइक्रोचिप की व्यवस्था की गई है, जिससे उनके मालिक का पता लगाना संभव होता है.

सिंगापुर में आवारा कुत्तों के लिए एक विशेष निगरानी प्रणाली है, जिसमें उनकी नसबंदी की जाती है, टीकाकरण होता है और फिर उन्हें सुरक्षित स्थानों पर रखा जाता है. तो हाल ही में तुर्की ने भी सड़कों से आवारा कुत्तों को हटाने का निर्णय लिया था, जिसके खिलाफ स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन हुए थे.

भारत में इस समस्या का समाधान एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें पशु अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश दरअसल इस बात का संकेत है कि आवारा कुत्तों की समस्या अब काबू से बाहर हो चुकी है और इसके समाधान के लिए सख्त कदम उठाए जाने की आवश्यकता है. विभिन्न राज्य सरकारों को इस समस्या के समाधान के लिए विशेष प्रयास करने होंगे. उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में आवारा कुत्तों की संख्या पहले ही नियंत्रित हो चुकी है, लेकिन कई अन्य राज्यों में इस समस्या का समाधान ढूंढने के लिए और कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है.

अंततः, सुप्रीम कोर्ट का आदेश एक अस्थायी समाधान नहीं हो सकता, बल्कि इसे एक स्थायी नीति की दिशा में एक कदम माना जाना चाहिए. यदि हम आवारा कुत्तों की समस्या को सुलझाना चाहते हैं, तो हमें नसबंदी, टीकाकरण, और शेल्टर होम्स के साथ-साथ जागरूकता अभियान, कड़े कानून और जिम्मेदार पालतू जानवरों की देखभाल के उपायों को भी एक साथ लागू करना होगा. खैर तब तक इस सवाल का जवाब खोजते है कि कुत्तों के होने से दिक्कत है या फिर ना होने से….

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