jyothi yarraji viral video : आज के इस दौड़ ने हमें कितना अकेला कर दिया है, यह शायद हमें तब समझ में आता है, जब हम कंटेंट्स के टेंस समंदर में डूबे होते हैं. हमें लगता है कि हमारे आसपास कितना कुछ है, सक्सेस, फेलियर, कोशिश, सपने और वे तमन्नाएं, जिनके पीछे हम हर रोज भागते हैं. लेकिन कभी-कभी अचानक यह एहसास गहरा हो जाता है कि हम आगे नहीं, बल्कि पीछे जा रहे हैं. मानवता की जो परिभाषा है, सामाजिकता की जो डोर है,वह इतनी कमजोर होती जा रही है कि अब फर्क दिखने लगा है. फर्क क्या है, कैसा है, कितना है,इसी का एक उदाहरण इन दिनों सोशल मीडिया पर तैर रहा है.
बीते दिनों डिजिटल वर्ल्ड के किसी अनजाने किनारे से यह दृश्य इस समंदर में उतरा और आज यह एक वीडियो बनकर सबकी नजरों में है. लोग उसे कंधा दे रहे हैं, उस पर भावनाएं लुटा रहे हैं.मैं यह इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि संघर्ष और सफलता,दोनों एक ही यात्रा के अलग-अलग पड़ाव हैं. सफलता एक मंज़िल है, जिसकी कोई गारंटी नहीं. वहां असफलता भी मिल सकती है. लेकिन संघर्ष एक रास्ता है,जिस पर चला तो जा सकता है. अक्सर हमें उम्मीद होती है कि कल कुछ बेहतर होगा, कल कुछ अच्छा होगा. इसी उम्मीद में हम संघर्ष के रास्ते पर अकेले चलते जाते हैं,चलते जाते हैं और फिर एक दिन हमारे हाथ में सफलता या असफलता का कोई प्रतीक आ जाता है. कहीं तालियां बजती हैं, कहीं एक खामोश मंजर खड़ा होता है, जो बताता है कि हमारा संघर्ष कितना मूल्यवान था.
तालियों के शोर में सफलता को अक्सर मुकम्मल मान लिया जाता है. लेकिन क्या कभी सोचा है,अगर ये तालियां खामोशी में बदल जाएं? अगर सफलता से अकेले जूझना पड़े? तब वह सफलता कितनी छोटी लगने लगती है. दरअसल, हुआ क्या है कि सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर एक वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो पर बहुत कुछ कहा जा रहा है, बहुत कुछ लिखा जा रहा है.
यह वीडियो है,दक्षिण कोरिया के गुमी शहर में आयोजित एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप का(वायरल वीडियो में दावों की सच्चाई की पुष्टि realisticmedia नहीं करता है) . भारत की ज्योति याराजी ने महिला 100 मीटर बाधा दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया. लगातार बारिश के कारण यह मुकाबला लगभग खाली स्टेडियम में हुआ. ज्योति ने 12.96 सेकेंड का समय निकालते हुए नया चैंपियनशिप रिकॉर्ड बनाया. रेस की शुरुआत में जापान की युमी तनाका और चीन की यानि वू आगे थीं, लेकिन आखिरी हर्डल्स के बाद ज्योति की जबरदस्त फिनिश ने सब कुछ बदल दिया. आज वही वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है. लोग भावुक होकर लिख रहे हैं कि इतनी बड़ी जीत, लेकिन स्टेडियम खाली था.
हम और आप अक्सर जिस सफलता की तलाश में रहते हैं, जिस शोर और जिस भीड़ की कामना करते हैं,वह हमसे कई बार बहुत दूर होती है. लेकिन यह जरूरी नहीं कि शोर ही सफलता की आखिरी पहचान हो. इंसान का खुश रहना, अपनी उपलब्धियों पर गर्व करना,यह भी बड़ी बात है. और मुझे लगता है कि ज्योति की सफलता सिर्फ इस बात में नहीं है कि वह भारत की सबसे तेज बाधा धाविका बनीं. उनकी सफलता इस बात में भी है कि उन्होंने खाली स्टेडियम में भी खुद को भरा हुआ महसूस किया.
कहानियां शब्दों की मोहताज नहीं होतीं. किरदार किसी एक किस्से में सिमटे नहीं रहते. जैसे नदी,जब निकलती है, तो उसकी मंज़िल समंदर से जाकर मिलना होती है. वह यह नहीं देखती कि कौन उसके साथ चला, कौन नहीं चला. कौन सा पत्थर छूट गया, कौन सा कंकड़ अटक गया, कौन सा तिनका पीछे रह गया. नदी बस बहती रहती है. उसे निकलते हुए कोई देखे या न देखे, पहाड़ों से या मैदानों से उसे फर्क नहीं पड़ता. और जब वह समंदर में मिलती है, तब भी कोई यह नहीं पहचान पाता कि कौन सी बूंद कहां से आई थी. लेकिन नदी का बहते रहना ही उसकी सबसे बड़ी सफलता है. शायद ज्योति याराजी की कहानी भी यही कहती है कि भीड़ हो या न हो, शोर हो या खामोशी,अगर आप बहते रहे, तो एक दिन समंदर आपका इंतजार जरूर करेगा.