बिहार चुनाव में जीविका दीदियों को पोलिंग एजेंट की तरह इस्तेमाल किया गया? जानें रिपोर्ट में क्या खुलासा हुआ…

Bihar politics : बिहार विधानसभा चुनाव के बाद इस बात को लेकर बहस तेज हो गई है कि ग्रामीण आजीविका मिशन (JEEViKA) से जुड़ी CM (कम्युनिटी मोबिलाइज़र) दीदियों को मतदान जागरूकता अभियान के नाम पर कहीं अतिसक्रिय चुनावी भूमिका तो नहीं दे दी गई? कई क्षेत्रों से सामने आई दीदियों की कार्यशैली और उनके अनुभवों ने इस पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

घर-घर जाकर महिलाओं को बूथ तक लाने का दावा

इंडिया टुडे हिन्दी की रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न जिलों की कई जीविका दीदियों ने बताया कि उन्हें सुबह से मतदान समाप्त होने तक घर-घर जाकर महिलाओं को बूथ तक पहुँचाने की जिम्मेदारी दी गई थी। बिहटा की एक CM दीदी ने बताया कि हमको कहा गया था कि जितनी महिला लिस्ट में हैं, सबको बोलकर भोट (वोट) डलवाना है। दिन में तीन-तीन बार जाना पड़ता था। दीदियों का कहना है कि उन्हें मतदाता सूची की एक कॉपी भी दी गई थी, ताकि वे उन परिवारों तक जाकर सुनिश्चित कर सकें कि महिलाएँ मतदान करें।

3-नॉक सिस्टम और MIS निगरानी

कुछ दीदियों ने यह भी बताया कि मतदान वाले दिन 3-नॉक सिस्टम लागू था, यानी, अगर कोई महिला मतदान के लिए नहीं निकली तो उसके घर दिन में कम से कम तीन बार जाना अनिवार्य था। इसके अलावा, एक MIS (मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम) भी बनाया गया था, जिसके ज़रिये यह मॉनिटर किया जा रहा था कि किस दीदी ने कितने घरों में संपर्क किया। चुनाव से ठीक पहले जीविका मिशन से जुड़ी अनेक महिलाओं के खातों में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत ₹10,000 स्थानांतरित हुए थे। विपक्ष का आरोप है कि यह राशि चुनावी लाभ पाने की रणनीति का हिस्सा थी, जबकि सरकार इसे नियमित कल्याणकारी योजना का क्रियान्वयन बता रही है।

चुनाव आयोग की सफाई

मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CMO), बिहार ने स्पष्ट किया है कि जीविका दीदियों को सिर्फ SVEEP गतिविधियों (मतदान जागरूकता कार्यक्रम) में शामिल किया गया था, न कि पोलिंग एजेंट के रूप में। अधिकारियों का कहना है कि उनकी प्राथमिक भूमिका मतदान के प्रति महिलाओं को प्रोत्साहित करना थी। हालांकि, कई रिपोर्टों के मुताबिक कुछ दीदियों ने स्वीकार किया कि उन्हें पर्दानशीं मतदाताओं की पहचान में भी पोलिंग टीमों की सहायता करनी पड़ी जो सामान्य SVEEP दायरे से बाहर की गतिविधि है।

महिला मतदान रिकॉर्ड स्तर पर

इस चुनाव में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक रही। बुनियादी ढांचे, सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं का असर तो था ही, लेकिन जीविका दीदियों की व्यापक भागीदारी को भी इसकी बड़ी वजह माना जा रहा है। विवाद के केंद्र में बड़ा सवाल यह है कि क्या दीदियों की भागीदारी जागरूकता तक सीमित थी, या उन्हें अनौपचारिक पोलिंग एजेंट की तरह इस्तेमाल किया गया? क्या सरकारी योजनाओं के लाभ और उनकी चुनावी सक्रियता के बीच कोई प्रत्यक्ष राजनीतिक लिंक मौजूद था? और क्या ऐसी तैनाती लोकतांत्रिक निष्पक्षता की सीमा को धुंधला करती है?

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