राहुल गांधी की देसी पॉलिटिक्स से खत्म होगा बिहार में कांग्रेस का 35 साल का वनवास ?

Congress in Bihar : बिहार की सियासत देश को राजनीतिक शॉक देता है.हालांकि ये सब होता है जनता के उंगली के इसारे पर ही. खैर फिलहाल बात करते हैं कांग्रेस की जो केंद्र में पिछले 11 साल और बिहार में 35 साल से वनवास पर है.इस बीच जब राहुल गांधी ने 17 अगस्त 2025 को सासाराम से अपनी 16 दिवसीय वोटर अधिकार यात्रा का आगाज किया तो इस बात की खुब चर्चा हो रही और पुछा जा रहा है कि क्या पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष की इस देसी पॉलिटिक्स से बिहार में कांग्रेस का वनवास खत्म होगा ? देखा जाए और जानकारों की मानें तो राहुल गांधी की यह वोटर अधिकार यात्रा राज्य में कांग्रेस की सियासी जमीन को फिर से मजबूत करने की एक कोशिश भी है, जो पिछले तीन दशकों में लगातार कमजोर होती रही है.

आजादी के बाद केंद्र की सत्ता बिहार की राजनीति का खुब बोलबाला था और 1980 के दशक के अंत तक बिहार में भी कांग्रेस का दबदबा था, लेकिन मंडल राजनीति के उभार ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया. फिर 1990 के बाद से कांग्रेस बिहार की सियासत में हाशिए पर चली गई. साढ़े तीन दशक बाद, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे नेता पार्टी को पुनः जनाधार जोड़ने के लिए सक्रिय हो गए हैं. राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा को बिहार में कांग्रेस की सियासी पुनरुत्थान की उम्मीदों के रूप में देखा जा रहा है.

कभी बुलेट पर सवारी करते हुए,कभी मखाना के खेतों में किसानों से मिलते हुए,तो कभी गमछा लपेटकर स्थानीय लोगों के साथ संवाद करते हुए राहुल ने अपनी छवि को पूरी तरह से बिहार के रंग में रंग लिया है. कुल मिलाकर देखें तो राहुल गांधी अपनी इस यात्रा में पूरी तरह से देसी अंदाज में दिखाई दे रहे हैं. ये संकेत है कि राहुल गांधी ने बिहार के ग्रामीण इलाकों,दलित,पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों को साथ लाने के लिए अपनी रणनीति को शहरी सियासी भाषाओं से बाहर निकाल कर गाँव-देहात की भाषा में ढाल लिया है.

पिछले कई चुनावों में कांग्रेस ने अपनी परंपरागत जड़ों से बहुत दूर होते हुए महज गठबंधन के सहारे चुनाव लड़ा है. इन सब के बीच यह कदम कांग्रेस के लिए एक बडी राहत हो सकती है.इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राहुल गांधी ने बिहार के विभिन्न हिस्सों में युवाओं और महिलाओं को मुख्य रूप से लक्ष्य किया. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी बिहार में अपनी यात्रा के दौरान महिला वोटरों को साधने में अहम भूमिका निभाती दिखाई दीं और इसका असर ग्रामीण क्षेत्रों में खासा देखा गया है.

राहुल गांधी की यात्रा ने एक बार फिर से कांग्रेस के परंपरागत वोटबैंक दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों को लामबंद किया है. इसके साथ ही कांग्रेस का दावा है कि पिछले कुछ महीनों में 65 लाख मतदाता सूची से हटा दिए गए,जिनमें अधिकतर गरीब और दलित वर्ग से थे. यह मुद्दा बीजेपी के ग्रामीण और युवा वोटबैंक पर असर डाल सकता है. राहुल गांधी ने इस यात्रा के दौरान भाजपा के हिंदुत्व कार्ड को भी चुनौती दी है,खासकर प्रियंका गांधी द्वारा जानकी मंदिर पूजा के बाद. इस प्रकार, कांग्रेस ने सियासी समीकरणों को उलटने का एक प्रयास किया है,जिसे शायद बीजेपी और जेडीयू ने पहले कभी सोचा भी न था.

कांग्रेस की स्थिति बिहार में पिछले कई वर्षों से कमजोर हुई है. 2010 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने केवल 4 सीटों पर जीत हासिल की और 2020 में यह आंकड़ा बढ़कर महज 19 सीटों तक पहुंच सका. लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस का प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा. 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को केवल एक सीट मिली और वोट शेयर भी घटकर 7.9% रह गया. यही नहीं भारत जोड़ो यात्रा के बाद भी कांग्रेस का बिहार में कोई खास असर देखने को नहीं मिला. लेकिन राहुल गांधी ने 2024 के चुनाव के बाद बिहार में कांग्रेस की स्थिति को भली-भांति समझ लिया था. तभी से उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने और चुनावी रणनीतियों को नए सिरे से तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाए. पार्टी ने अपने प्रदेश अध्यक्ष को भी बदला और भूमिहार समाज से आने वाले अखिलेश प्रसाद की जगह दलित समुदाय से राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाया. इसके अलावा,कन्हैया कुमार और पप्पू यादव जैसे नेताओं को भी सक्रिय किया गया है, जो राज्य की सियासी तस्वीर को और गरमा सकते हैं.

राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा का उद्देश्य बिहार में कांग्रेस की सियासी जमीन को फिर से मजबूत करना है,लेकिन इसके सफलता या असफलता का आकलन 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों पर निर्भर करेगा. इस यात्रा ने बिहार की सियासत में हलचल पैदा की है और बीजेपी,जेडीयू को चुनौती दी है. हालांकि,यह कहना मुश्किल है कि कांग्रेस इस यात्रा के जरिए 35 साल के वनवास को खत्म कर पाएगी,लेकिन राहुल गांधी ने जो सियासी तस्वीर खींची है, वह निश्चित रूप से बिहार की सियासी राजनीति को एक नई दिशा दे सकती है. यह भी कहना…ये कहना गलत नहीं होगा कि राहुल गांधी की यात्रा ने एक नई उम्मीद जगी है और बिहार में कांग्रेस के सियासी पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को गति दी है. अब देखना यह होगा कि यह हलचल आगामी चुनावों में किस रूप में परिणत होती है.

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