Tej Pratap Yadav politics : बिहार के पारंपरिक खानपान में लिट्टी और चोखा का जिक्र खूब किया जाता है, लेकिन यहां की राजनीति में अगर किसी व्यंजन ने सबसे ज़्यादा राजनीतिक रंग पकड़ा है, तो वह है चूड़ा-दही. सामान्य तौर पर सात्विक भोजन माने जाने वाले इस साधारण से व्यंजन ने खूद को बिहार में सत्ता, संघर्ष और संदेश का माध्यम बना दिया गया है. ठंड के मौसम में जहां लोग गरम कपड़े और गरम चाय ढूंढते हैं, वहीं बिहार की सियासी गलियारों में चूड़ा-दही अब गरम राजनीति की पहचान बन चुका है. मसलन मकर संक्रांति पर आयोजित चूड़ा-दही भोज सिर्फ एक सामाजिक आयोजन नहीं रह जाता, बल्कि वह एक ऐसा राजनीतिक मंच बन जाता है, जहां रिश्तों की गर्माहट भी दिखाई देती है और सियासी समीकरणों की ठंडक भी.
जानकार कहते है कि पॉलिटिकल डिप्लोमेसी के इस देशी अंदाज की शुरूआत राजद सुप्रिमो लालू यादव ने की थी. हालांकि कभी इस भोज को लेकर कोर्ट में भिड़ जाने वाले लालू यादव खूद इस बार इस आयोजन से दूर रहे. लेकिन फिर भी लालू परिवार के लिए यह खास रहा.इस बार यह भोज खास इसलिए था क्योंकि इसके केंद्र में थे तेज प्रताप यादव, वही तेज प्रताप जिसे लालू यादव ने परिवार और पार्टी से निष्कासित कर दिया है. जिसके बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर कई अटकलें भी लगाई जाने लगी. लेकिन राष्ट्रीय जनता दल और परिवार से निष्कासन के बाद अपनी राजनीतिक ज़मीन की तलाश में तेज प्रताप ने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले नई पार्टी बनायी , चुनाव लड़े लेकिन जनता का भरोसा नहीं जीत सके. हार के बाद उनकी राजनीति खत्म मानी जा रही थी, लेकिन मकर संक्रांति के मौके पर उन्होंने ऐसा दांव खेला कि पूरा बिहार फिर से उनकी चर्चा करने लगा है.
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तेज प्रताप यादव ने इस भोज को महज परंपरा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे एक राजनीतिक आयोजन में तब्दील कर दिया. उन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों के दिग्गज नेताओं को न्योता दिया. राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री तक, बीजेपी और जदयू के बड़े नेताओं से लेकर पुराने समाजवादी चेहरों तक सबको एक मंच पर लाने की कोशिश की. जिसमें काफी हद तक वो सफल भी रहे, इस भोज से पहले तेज प्रताप ने जिस तरह से नेताओं से मुलाकात की, उन्हें न्योता दिया, उनके साथ तस्वीरें खिंचवाईं उसका संकेत साफ था कि वह खुद को राजनीतिक हाशिये पर नहीं, बल्कि सियासी केंद्र में रखना चाहते हैं.
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सबसे दिलचस्प तस्वीर तब सामने आई जब लंबे अरसे बाद लालू प्रसाद यादव खुद तेज प्रताप के आवास पहुंचे. हालांकि इस पूरे आयोजन में जो सबसे ज्यादा खटका, वह थी तेजस्वी यादव की गैरमौजूदगी. सबको उम्मीद थी कि लालू यादव के पहुंचते ही तेजस्वी भी मंच पर दिखेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. तेजस्वी के नहीं पहुंचने पर तेजप्रताप थोड़े नराज भी दिखे..लेकिन तेजस्वी का इस आयोजन से दूरी बनाकर रखना कई सवाल खड़े करता है. विधानसभा चुनाव में हार के बाद जिस तरह से उन्होंने मीडिया और कार्यकर्ताओं से दूरी बनाई है, वह भी संकेत देता है कि विपक्ष की राजनीति जिस आत्ममंथन के दौर में है वो कितना लंबा है. चुनावी हार के कारण क्या तेजस्वी बैकफुट पर हैं? क्या राजद की राजनीति में नेतृत्व का संकट खड़ा हो रहा है? और क्या इस खाली जगह को तेज प्रताप भरने की कोशिश कर रहे हैं? खैर…
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तेज प्रताप यादव के इर्द-गिर्द कई चर्चा तेज है जिसमें बीजेपी जॉइन करने की अटकलें भी है. इसको लेकर जब उनसे पूछा जाता है तो उनका जवाब होता है, समय आएगा तो सब साफ हो जाएगा. यानी न हां, न ना , सस्पेंस की राजनीति मगर तर्क करने वाली बात ये है कि जब उनसे आरजेडी में वापसी को लेकर सवाल होता है तो वह कहते हैं कि वह तो सलाह देंगे कि राजद को खुद का विलय जन शक्ति जनता दल में कर लेना चाहिए. यह बयान साफ करता है कि तेज प्रताप खुद को अब सिर्फ लालू परिवार का सदस्य नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में पेश करना चाहते हैं. अगर राजनीतिक नजरिए से देखें तो तेज प्रताप यादव अपने मकसद में काफी हद तक सफल रहे. एक मंच पर तमाम बड़े नेताओं को खड़ा करना, खुद को चर्चा के केंद्र में लाना और यह दिखाना कि वह अभी भी राजनीतिक खेल में हैं, यह किसी भी नेता के लिए बड़ी उपलब्धि होती है.
तेज प्रताप यादव ने यह साफ कर दिया है कि वह हार मानने वालों में से नहीं हैं. सवाल सिर्फ इतना है कि उनकी यह पॉलिटिकल डिप्लोमेसी उन्हें सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाएगी या सिर्फ सुर्खियों तक ही सीमित रह जाएगी? आने वाले दिनों में यह तय होगा कि तेज प्रताप की राजनीति, नई पार्टी, नया गठबंधन या पुरानी सियासत में नई एंट्री, किस करवट बैठेगी. फिलहाल बिहार की राजनीति चूड़ा-दही के स्वाद के साथ तेज प्रताप की चालों का इंतज़ार कर रही है.