Indian media credibility : खबर है कि आज शाम रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत पहुंच रहे हैं। इसी के साथ एक और बड़ी खबर यह है कि उन्होंने भारतीय मीडिया को एक विशेष इंटरव्यू भी दिया है, जिसे भारत के प्रमुख मीडिया समूह इंडिया टुडे ने किया है। एक पत्रकार और दुनिया के बड़े नेता के बीच की यह बातचीत सिर्फ एक इंटरव्यू नहीं, बल्कि भारतीय मीडिया की वैश्विक पहुंच और बढ़ते प्रभाव का प्रतीक है।
जब भारत में मीडिया की बात होती है, तो बहस अक्सर दो ध्रुवों में बंट जाती है।एक तरफ मीडिया पर पक्षपात, निष्पक्षता की कमी और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं, तो दूसरी तरफ सच्चाई यह भी है कि लोग आज भी मीडिया को देखते हैं, सुनते हैं और उसकी बातों के आधार पर अपनी राय बनाते हैं। गोदी मीडिया जैसे आरोप, नाराजगियां और असहमति अपनी जगह हैं, जिस पर अलग से गंभीर बहस हो सकती है।
लेकिन इस समय असल सवाल यह है कि जब एक ग्लोबल लीडर भारतीय मीडिया को इंटरव्यू देता है, तो वह सिर्फ एक टीवी कार्यक्रम नहीं है बल्कि वह भारत की पत्रकारिता की वैश्विक स्वीकार्यता का संकेत होता है। एक तरफ सच्चाई है कि भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री इंटरव्यू देने से बचते हैं,प्रेस कॉन्फ्रेंस से बचते हैं(हालाँकि प्रधानमंत्री मोदी ने कई व्यक्तिगत इंटरव्यू दिए हैं।) दूसरी ओर विश्व राजनीति के सबसे शक्तिशाली चेहरों में शामिल व्लादिमीर पुतिन का भारतीय मीडिया से संवाद अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।
आज जब हम वैश्विक पत्रकारिता की बात करते हैं, तो BBC, CNN और Al Jazeera जैसे संस्थानों का नाम स्वाभाविक रूप से लिया जाता है। लेकिन अब भारत का मीडिया भी उसी वैश्विक स्पेस में अपनी जगह बनाने लगा है। पुतिन का इंटरव्यू इसी दिशा में एक मजबूत कदम माना जा सकता है।
आप भारतीय मीडिया से नाराज़ हो सकते हैं, आपको उससे शिकायत हो सकती है, आप उसकी आलोचना कर सकते हैं और यह आपका अधिकार भी है। लेकिन इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि भारतीय मीडिया की वैश्विक पहुंच लगातार बढ़ रही है। यह संभव है कि आने वाले समय में यही कदम भारतीय पत्रकारिता के लिए मील का पत्थर साबित हों।
हालांकि यह लड़ाई बहुत पहले से जारी है… NDA सरकार से पहले (2014 तक) भी भारतीय मीडिया की वैश्विक संस्थानों और नेताओं तक पहुंच थी, लेकिन वर्तमान की तुलना में कम औपचारिक और अनन्य (exclusive) थी। उस समय विश्व बैंक और IMF जैसी आर्थिक संस्थाओं के प्रमुख नियमित रूप से भारतीय आर्थिक मीडिया को ब्रीफिंग देते थे… उदाहरण के लिए, विश्व बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष रॉबर्ट ज़ोलिक ने 2006 में भारत यात्रा के दौरान प्रेस से बात की थी। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 2006 की भारत यात्रा और बराक ओबामा ने 2010 की यात्रा के दौरान संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जहां भारतीय पत्रकारों ने उनसे भारत-अमेरिका परमाणु समझौते जैसे मुद्दों पर सवाल पूछे। हालांकि 2014 से पहले के युग में भारतीय पत्रकारिता मुख्य रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस और समूह इंटरैक्शन तक सीमित थी और यह चलन अपेक्षाकृत कम था कि व्लादिमीर पुतिन जैसे किसी प्रमुख विश्व नेता ने विशेष रूप से भारतीय टेलीविजन नेटवर्क को कोई व्यक्तिगत, विस्तृत साक्षात्कार दिया हो, जैसा कि पुतिन द्वारा इंडिया टुडे को दिए गए साक्षात्कार की खबर आ रही है।
किसी ने सही कहा है पत्रकारिता का स्वर्णिम युग न तो कभी था और न ही कभी आएगा, पत्रकारिता हमेशा अपने वर्तमान में ही सबसे ज़्यादा प्रासंगिक होती है और शायद हम आज उसी दौर को जी रहे हैं। आज जब भारतीय मीडिया, BBC और CNN जैसे संस्थानों के साथ प्रतिस्पर्धा की स्थिति में खड़ा दिखाई देने लगा है, तो यह साफ है कि हमारी दौड़ शुरू हो चुकी है। हो सकता है कि जिस तरह भारत आज दुनिया को कई क्षेत्रों में रास्ता दिखा रहा है, आने वाले समय में पत्रकारिता के क्षेत्र में भी भारत दिशा देने वाला देश बने।