Bihar politics : बिहार विधानसभा के बजट सत्र में सोमवार को उस समय असामान्य राजनीतिक दृश्य देखने को मिला, जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के विधायक एक ही मुद्दे पर एकजुट होकर सरकार के सामने खड़े नजर आए. यह मुद्दा था विधायक क्षेत्र विकास निधि (MLA फंड) की राशि बढ़ाने का. सदन में इसको लेकर बहस इतनी तीखी हो गई कि कुछ देर के लिए यह समझना मुश्किल हो गया कि विरोध कौन कर रहा है और समर्थन कौन.
सत्ता पक्ष के विधायकों ने खोला मोर्चा
सबसे पहले भाजपा विधायक प्रमोद कुमार ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के दौरान वर्तमान निधि राशि को अपर्याप्त बताते हुए कहा कि एक करोड़ रुपये में से करीब 25–26 प्रतिशत राशि जीएसटी, रॉयल्टी और टीडीएस के रूप में कट जाती है. उन्होंने कहा कि जब अन्य राज्यों में विधायक निधि पांच करोड़ रुपये तक है, तो बिहार जैसे बड़े राज्य में राशि बढ़ाई जानी चाहिए. उन्होंने पड़ोसी राज्य झारखंड सहित केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां विधायक निधि अधिक है, जबकि निर्माण सामग्री जैसे सीमेंट और बालू की कीमतों में भारी वृद्धि हो चुकी है.
भाजपा के ही विधायक नीरज कुमार बबलू ने इस मांग का समर्थन करते हुए कहा कि बीते वर्षों में योजनाओं की लागत लगातार बढ़ी है, लेकिन विधायक निधि में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हुई. उन्होंने कहा कि हर साल राज्य का बजट बढ़ता है, ऐसे में क्षेत्र विकास निधि बढ़ाने में सरकार को कठिनाई नहीं होनी चाहिए. इसी क्रम में विधायक सुनील कुमार ने कहा कि वर्तमान में चार करोड़ रुपये की निधि से महज 20–25 योजनाएं ही पूरी हो पाती हैं. उन्होंने तर्क दिया कि एक विधायक क्षेत्र में औसतन 40 पंचायत या शहरी वार्ड होते हैं, ऐसे में सीमित राशि से सभी क्षेत्रों की अपेक्षाओं को पूरा करना संभव नहीं है. उन्होंने कहा कि हम विकास कार्य करना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी आड़े आ रही है.
विपक्ष ने भी दिया समर्थन
जैसे ही सत्ता पक्ष के विधायक मुखर हुए, विपक्षी दलों के सदस्य भी इस मांग के समर्थन में खड़े हो गए. कुछ ही देर में सदन का माहौल गरमा गया. सत्ता और विपक्ष के सदस्य एक सुर में सरकार से स्पष्ट घोषणा की मांग करने लगे. यहां तक कि कुछ विधायकों ने इस मुद्दे पर वोटिंग कराने की भी आवाज उठाई.
सरकार की ओर से जवाब
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए वित्त मंत्री विजेंद्र यादव ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि यदि केंद्र सरकार सांसद निधि में वृद्धि करती है, तो राज्य सरकार भी विधायक निधि बढ़ाने पर विचार करेगी. हालांकि यह जवाब विधायकों को संतोषजनक नहीं लगा. कई सदस्यों ने इसे टालमटोल भरा उत्तर बताया. सदन की कार्यवाही के दौरान विधानसभा अध्यक्ष बार-बार व्यवस्था बनाए रखने की अपील करते रहे, लेकिन शोर-शराबा जारी रहा. आखिरकार उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करेगी. उन्होंने आश्वासन दिया कि सभी वित्तीय और प्रशासनिक पहलुओं की समीक्षा के बाद उचित निर्णय लिया जाएगा. इसके बाद सदन का माहौल धीरे-धीरे शांत हुआ और कार्यवाही आगे बढ़ सकी.
क्या है इसके राजनीतिक मायने
सोमवार की कार्यवाही ने यह संकेत दिया कि विधायक निधि का मुद्दा अब केवल विपक्ष का राजनीतिक हथियार नहीं रह गया है. बढ़ती महंगाई, निर्माण लागत में वृद्धि और क्षेत्रीय विकास की बढ़ती अपेक्षाओं के बीच सत्ता पक्ष के विधायक भी अपनी ही सरकार पर दबाव बनाने से पीछे नहीं हट रहे.