बिहार में नई राजनीतिक करवट..! सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने से पूरा हुआ 93 साल पुराना संकल्प

Kushwaha politics Bihar : बिहार की राजनीति में सत्ता की कुर्सी जातियों के समीकरण से तैयार होती है. विकास के तमाम वादों के इतर राज्य की राजनीति में जातियां ही तय करती है कि कौन नेता बनेगा.ऐसा हम क्यों कह रहे हैं. दरअसल बिहार में नीतीश के बाद सम्राट चौधरी के रूप में नया मुख्यमंत्री मिला है. वो राज्य के 24वें मुख्यमंत्री है. पद ग्रहण करने के बाद से उनके जाति को लेकर कई चर्चा की जा रही हैं. सम्राट चौधरी कुशवाहा समुदाय से आते हैं. कुशवाहा समुदाय बिहार में यादवों के बाद दूसरा सबसे बड़ा पिछड़ा वर्ग (OBC) समूह है, जिसकी जनसंख्या लगभग 6-7 प्रतिशत मानी जाती है. ऐसे में उनकी नियुक्ति को बिहार की राजनीति में लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा) समीकरण को साधे रखने के एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है. कुशवाहा समुदाय से बिहार के मुख्यमंत्री बनने वाले सम्राट चौधरी पहले नहीं है. इससे पहले कुशवाहा समाज से सबसे पहले सतीश प्रसाद सिंह मुख्यमंत्री बने थे. हालांकि वे 1968 में मात्र 5 दिनों के लिए मुख्यमंत्री पद पर रहे थे.

कुशवाहा राजनीति में नया चेहरा

सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के पहले तक राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख और राज्यसभा सांसद उपेन्द्र कुशवाहा अपने समुदाय के सबसे बड़े नेता माने जाते रहे हैं लेकिन मुख्यमंत्री बन सम्राट चौधरी ने अपनी लकीर लंबी कर दी है. सम्राट के मुख्यमंत्री बनने पर उपेन्द्र कुशवाहा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि बिहार की जनता को इस फैसले की उम्मीद थी। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का भी आभार व्यक्त किया। उनके अलावा पूर्व सांसद नागमणि कुशवाहा ने सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने को अपने पिता और समाजवादी नेता जगदेव प्रसाद के संघर्षों का परिणाम बताया। जगदेव प्रसाद को बिहार का लेनिन भी कहा जाता है। खैर बिहार की राजनीति में हो रहा यह बदलाव यहीं तक सीमित नहीं है. बल्कि बिहार की राजनीति में अब सम्राट चौधरी एक प्रमुख कुशवाहा नेता के रूप में साबित हो चुके हैं। हालांकि अभी इसमें कई पड़ाव आने बाकी हैं लेकिन इतना तो साफ हो चुका है कि उन्होंने उपेन्द्र कुशवाहा को पीछे छोड़ते हुए अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। उनके पिता शकुनी चौधरी भी एक सम्मानित नेता थे, लेकिन सम्राट जैसा व्यापक प्रभाव नहीं बना सके।

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त्रिवेणी संघ का ऐतिहासिक संदर्भ

सम्राट की यह राजनीतिक जीत उस संघर्ष की सफलता है जिसकी शुरुआत 1933 में हुआ था. जानकारी के लिए बता दें कि 1933 में पिछड़े वर्गों को राजनीतिक ताकत देने के उद्देश्य से त्रिवेणी संघ का उदय हुआ था. यह संघ यादव, कुर्मी और कोइरी (कुशवाहा) समुदायों का संगठन था। बिहार की राजनीतिक अतीत को देखें तो त्रिवेणी संघ के पहले स्तंभ यादव समुदाय को सत्ता का स्वाद बी.पी. मंडल और दरोगा प्रसाद राय के माध्यम से मिला और फिर असली राजनीतिक ताकत 1990 में लालू प्रसाद यादव के सत्ता में आने के बाद मिला। इसके बाद उनकी पत्नी राबड़ी देवी के साथ मिलकर यादव राजनीति ने लंबे समय तक राज्य पर प्रभाव बनाए रखा। वहीं  दूसरे स्तंभ कुर्मी समुदाय का नेतृत्व नीतीश कुमार ने किया, जो राज्य के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्यमंत्री बने।

कुशवाहा समुदाय की लंबी प्रतीक्षा

और अब तीसरे स्तंभ कुशवाहा (कोइरी) समुदाय को भी सत्ता का स्वाद मिल चुका है. हालांकि इसके लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा। सतीश प्रसाद सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद उपेन्द्र कुशवाहा ने कई राजनीतिक प्रयोग किए, लेकिन वे मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंच सके और अब सम्राट चौधरी ने इस कमी को पूरा किया है। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के साथ यह कहा जा रहा है कि त्रिवेणी संघ के तीनों स्तंभ यादव, कुर्मी और कुशवाहा आखिरकार सत्ता के शीर्ष तक पहुंच चुके हैं। इससे बिहार की सामाजिक-राजनीतिक संरचना में एक ऐतिहासिक संतुलन स्थापित होता दिख रहा है।

राजनीतिक सफर और रणनीतिक बदलाव

2017 में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने तेजी से राजनीतिक उभार हासिल किया। खासकर 2022 में नीतीश कुमार के एनडीए से अलग होने के बाद उन्होंने विपक्ष में आक्रामक भूमिका निभाई। सम्राट चौधरी ने एक समय नीतीश कुमार के खिलाफ पगड़ी पहनकर विरोध किया था, जिसे उन्होंने बाद में अयोध्या जाकर उतारा। 2023 में उन्हें भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और 2024 में नीतीश कुमार के एनडीए में लौटने के बाद उन्होंने रणनीतिक बदलाव करते हुए उनके साथ तालमेल बैठाया। धीरे-धीरे वे प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालने लगे और 2025 तक उन्हें नीतीश कुमार का करीबी माना जाने लगा और अब वो मुख्यमंत्री हैं.

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