बिना टेंडर बनेगा दरभंगा एम्स..! मुख्य द्वार के बाद अब पूरी परियोजना को लेकर RTI में नया खुलासा

Darbhanga AIIMS : आपने बीरबल की खिचड़ी वाली कहानी तो सुनी ही होगी…जिसमें जमीन पर आग जल रही होती है और कई फीट ऊपर लटकी हांडी में खिचड़ी पकाने का दावा किया जाता है. कुछ ऐसा ही हाल अब बिहार के बहुप्रतीक्षित दरभंगा एम्स का नजर आ रहा है. स्थानीय नेताओं से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक कई राजनीतिक मंचों से यह दावा करते दिखे कि दरभंगा एम्स बिहार के स्वास्थ्य क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि हैं और जल्द ही फीता कटने वाला है. हालांकि जमीनी तस्वीर इन दावों से अलग कहानी बयां कर रही है.

शिलान्यास के बाद भी अटका है काम..!

घोषणा के 11 साल बाद और शिलान्यास के डेढ़ साल बीत जाने के बावजूद दरभंगा एम्स का मुख्य अस्पताल भवन और अकादमिक ब्लॉक का निर्माण कार्य अब तक जमीन पर शुरू नहीं हो पाया है.  इतना ही नहीं, दरभंगा एम्स के जिस मुख्य द्वार और निर्माण को लेकर राजनीतिक दावे किए जा रहे हैं, उसकी वास्तविक स्थिति और नए खुलासों से मिल रहे संकेत इस ओर इशारे कर रहे है कि दरभंगा एम्स सिर्फ चुनावी घोषणाओं और राजनीतिक बयानों तक सीमित परियोजना बनकर रह गया है? बिहार के इस दूसरे सबसे बड़े प्रस्तावित चिकित्सा संस्थान को लेकर उठ रहे सवाल अब सिर्फ निर्माण की गति पर नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर रहा है.

दरभंगा एम्स के निर्माण को लेकर जारी असमंजस के बीच अब इसके मुख्य प्रवेश द्वार को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में संस्था द्वारा मांगे गए आरटीआई के जवाब के हवाले से कहा गया कि एम्स दरभंगा के निर्माण कार्य की जिम्मेदारी संभाल रही सरकारी कंपनी एचएससीसी लिमिटेड ने आरटीआई के जवाब में कहा है कि संबंधित काम अभी प्रक्रिया के अधीन है. एचएससीसी ने अपने जवाब में यह भी दावा किया कि मुख्य द्वार के लिए कोई अलग टेंडर जारी नहीं किया गया है और न ही इसके लिए कोई अलग स्वीकृति पत्र जारी हुआ है. इस बीच सहरसा के आरटीआई एक्टिविस्ट विनोद कुमार झा को हॉस्पिटल सर्विस कंसल्टेंसी कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचएससीसी इंडिया) से मिले जवाब में कहा गया है कि दरभंगा एम्स के मुख्य निर्माण कार्य का टेंडर अभी तैयार नहीं हुआ है और प्रक्रिया जारी है. एचएससीसी ने यह भी कहा है कि टेंडर तैयार नहीं होने के कारण निर्माण पर होने वाले कुल खर्च की जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है. हालांकि मीडिया रिपोर्ट की मानें तो दरभंगा एम्स प्रोजेक्ट का शुरुआती बजट 59 फीसदी से बढ़कर ₹2006 करोड़ हो गया है, लेकिन हैरान करने वाली ये है कि अब तक इसमें से 1% राशि भी खर्च नहीं की जा सकी है.

2015 से चल रही कवायद लेकिन अब भी इंतजार

20 मई 2026 को जारी इस आरटीआई जवाब ने दरभंगा एम्स की प्रगति पर नई बहस छेड़ दी है. करीब एक दशक से चर्चा में रहे इस प्रोजेक्ट का शिलान्यास 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था, लेकिन अब तक मुख्य निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया है. जानकारी के लिए बता दें कि बिहार में एम्स जैसे एक नए संस्थान की घोषणा वर्ष 2015 के केंद्रीय बजट में हुई थी. इसके बाद दरभंगा, सहरसा समेत कई जिलों में एम्स खोलने की मांग तेज हुई लेकिन लंबे राजनीतिक और प्रशासनिक मंथन के बाद 2020 में दरभंगा को एम्स के लिए चुना गया और केंद्रीय कैबिनेट ने भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. हालांकि, इसके बाद से ही जमीन का मामला प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी बाधा बना रहा. पहले दरभंगा मेडिकल कॉलेज परिसर (डीएमसीएच) और फिर अशोक पेपर मिल की जमीन को लेकर चर्चा हुई. अंत में शोभन बाईपास क्षेत्र में जमीन तय की गई.

बता दें कि शोभन बाईपास की जमीन को लेकर भी विवाद रहा. स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठता रहा कि जहां जलभराव की समस्या है, वहां बड़े अस्पताल का निर्माण कैसे होगा. इसके बाद बिहार सरकार ने जमीन को विकसित करने और गड्ढा भरने के लिए करीब 309 करोड़ रुपये खर्च करने की स्वीकृति दी. वहीं, दरभंगा एम्स की अनुमानित लागत करीब 1264 करोड़ रुपये बताई जाती रही है. ऐसे में जमीन तैयार करने पर होने वाला खर्च भी चर्चा का विषय बना रहा.

आरटीआई में पूछे गए सवालों पर अलग-अलग जवाब

विनोद कुमार झा ने दरभंगा एम्स से जुड़ी जानकारी के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और एचएससीसी दोनों से सवाल पूछे थे. उनके अनुसार स्वास्थ्य मंत्रालय ने आरटीआई के तहत सूचना देने से इनकार किया, जबकि एचएससीसी ने जवाब उपलब्ध कराया. एचएससीसी के जवाब में टेंडर प्रक्रिया लंबित होने की बात सामने आने के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि आखिर वर्षों से प्रतीक्षित इस परियोजना का वास्तविक निर्माण कब शुरू होगा. इसके साथ- साथ आरटीआई के जवाब के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि जब मुख्य द्वार के लिए अलग से कोई टेंडर या स्वीकृति नहीं हुई, तो आखिर इस संरचना का निर्माण किस प्रक्रिया के तहत हुआ. एचएससीसी के जवाब में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि इस गेट का डिजाइन, निर्माण या मंजूरी किस स्तर पर दी गई.

दरभंगा एम्स की धीमी गति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसके बाद घोषित कई अन्य एम्स संस्थानों में निर्माण पूरा हो चुका है या वहां मेडिकल पढ़ाई शुरू हो चुकी है. कई नए एम्स में वर्ष 2021 तक शैक्षणिक गतिविधियां शुरू हो गई थीं. ऐसे में दरभंगा एम्स के निर्माण में देरी बिहार के लिए चिंता का विषय है.

सोर्स: इंडिया टुडे की रिपोर्ट और वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र के फेसबुक पोस्ट के आधार पर