Nepotism in politics : बिहार विधानसभा चुनावों में RJD को बड़ा झटका लगा. पार्टी को ना सिर्फ चुनाव में हार का समाना करना पड़ा बल्कि पार्टी की सीटें भी 75 से गिरकर 25 पर आ गई हैं। लेकिन इसी बीच एक दिलचस्प ट्रेंड सामने आया है. जो पार्टी पर लगने वाले आरोपों से जुड़ा हुआ हैं….मतलब की राजनीतिक वंशवाद (डायनास्ट-नेतृत्व) अब भी RJD में मजबूती से बना हुआ है। आसान भाषा में कहें तो परिवारवाद.
परिवारवाद में नंबर वन है राजद
नए विधानसभा में कुल 59 विधायक ऐसे हैं जिनका सत्ता में पारिवारिक नाता है, यह पुराने विधानसभा के 70 वंशवादी विधायकों की तुलना में थोड़ा कम है। बिहार विधानसभा में 243 सदस्यों की संख्या है, पीछले विधानसभा में यह संख्या 28.81% था जो इस वार गिरकर 24.28% हो गया. लेकिन RJD वंशवाद में अलग राह पर है. RJD के 25 नए विधायकों में से 10 (40%) ऐसे हैं जो किसी न किसी राजनेतिक परिवार से आते हैं, यह पिछली सभा में उनके वंशवादी हिस्से (42%) के करीब है।
- तेजस्वी यादव- पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के बेटे
- ओसामा शाहाब -पूर्व RJD नेता मोहम्मद शाहाबुद्दीन के बेटे
- करिश्मा राय – पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद राय की पोती
अन्य पार्टियों में भी है परिवारवाद
NDA की सहयोगी पार्टी HAM(S) में वंशवाद और भी गहरा है, उनके सिर्फ 5 विधायक हैं और उनमें से 80% (यानि 4) वंशवादी पृष्ठभूमि से आते हैं। BJP में भी कुछ वंशवादी हैं, लेकिन उनकी हिस्सेदारी RJD जितनी ज़्यादा नहीं है। नए BJP विधायक-वंशवादियों की संख्या 21 है, जो उनकी कुल सीटों का लगभग 23.6% है। JD(U) में भी 19 विधायक वंशवादी हैं।
बिहार की राजनीति में परिवारवाद का पैठ
नए वंशवादी विधायकों में 45 दूसरी पीढ़ी के नेता हैं, यानी उनके माता-पिता विधायक, सांसद या MLC रह चुके हैं। तो तीसरी पीढ़ी के भी दो विधायक हैं, जैसे कि BJP के Devesh Kant Singh जो अपने पिता और दादा दोनों पूर्व विधायक थे। कुछ वंशवादी रिश्ते पति-पत्नी, भाई-बहन, ससुराल जैसे हैं। कुल मिलाकर देखें तो बिहार की राजनीति में वंशवाद अभी खत्म नहीं हुआ है, खासकर RJD में। सीटों की बड़ी गिरावट के बावजूद, पार्टी का पारिवारिक नेतृत्व उतना ही मजबूत बना हुआ है। यह सवाल उठाता है कि राजनीति में बदलाव कब तक सिर्फ जनाधार और मुद्दों के आधार पर होगा, न कि परिवार के नाम पर।