bihar assembly election 2025 : बिहार की सियासत में एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कभी करीबी रहे दो नेता आरसीपी सिंह (rcp singh) और प्रशांत किशोर अब एक ही मंच पर नजर आ रहे हैं। जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामचंद्र प्रसाद सिंह ने अपनी पार्टी ‘आप सबकी आवाज’ का विलय प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज में कर दिया है। यह घटनाक्रम 2025 के विधानसभा चुनावों से पहले एक बड़े सियासी फेरबदल के रूप में देखा जा रहा है।
कभी नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी के तौर पर देखे जाने वाले ये दोनों नेता अब उनके खिलाफ ही एकजुट हो गए हैं। सवाल यह है कि क्या ये गठजोड़ नीतीश की राजनीति को चुनौती दे सकता है? और क्या आरसीपी सिंह की एंट्री जन सुराज की ताकत को ज़मीन पर बढ़ा पाएगी?
rcp singh के नौकरशाह से राजनेता बनने तक का सफर
आरसीपी सिंह 1984 बैच के आईएएस अफसर रहे हैं। उन्होंने केंद्र सरकार और बिहार में नौकरशाही के अहम पदों पर काम किया। लेकिन उनकी असली पहचान बनी नीतीश कुमार के प्रमुख सचिव के तौर पर, जब बिहार में सुशासन की नई इबारत लिखी जा रही थी। नीतीश के पहले कार्यकाल (2005–2010) में प्रशासनिक सुधारों, अपराध नियंत्रण और आधारभूत विकास में आरसीपी की अहम भूमिका रही। उन्हें ‘सुशासन बाबू’ की छवि गढ़ने वाला ‘मुख्य शिल्पकार’ माना जाता है। 2010 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और सीधे जेडीयू में शामिल हो गए।
rcp singh का राजनीतिक में उंचाई से पतन
राजनीति में आने के बाद आरसीपी सिंह ने जेडीयू के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में काम किया। वह नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों में शामिल हो गए और पार्टी में तेजी से ऊपर चढ़ते गए। महासचिव से लेकर राज्यसभा सांसद और फिर 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने तक, उन्होंने एक ताकतवर नेता की छवि बनाई। हालांकि 2021 में जब उन्होंने नीतीश की इच्छा के विरुद्ध केंद्र सरकार में मंत्री पद स्वीकार किया, वहीं से दरारें खुलकर सामने आने लगीं। 2022 में राज्यसभा से दोबारा नामांकन न मिलने के बाद उन्हें केंद्र की कैबिनेट से बाहर होना पड़ा। जुलाई 2022 में जेडीयू छोड़ते हुए उन्होंने नीतीश कुमार की तुलना “डूबते जहाज” से की। इसके बाद वह भाजपा में शामिल हुए, लेकिन वहां भी उन्हें सियासी जमीन नहीं मिल सकी। 2024 के लोकसभा चुनाव में टिकट पाने की कोशिशें विफल रहीं।
राजनीतिक हाशिए पर जाते देख आरसीपी सिंह ने मई 2024 में अपनी नई पार्टी ‘आप सबकी आवाज़’ लॉन्च की। हालांकि पार्टी आठ महीने में ही कोई बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ सकी। अब उन्होंने इस पार्टी का जन सुराज में विलय कर दिया है। यानी पिछले तीन वर्षों में वह चार राजनीतिक प्लेटफॉर्म बदल चुके हैं, जेडीयू, बीजेपी, आसा और अब जन सुराज।
जन सुराज में rcp singh का क्या योगदान होगा ?
प्रशांत किशोर ने जन सुराज को एक गैर-परंपरागत राजनीतिक आंदोलन के रूप में खड़ा किया है, जो जाति की राजनीति के पार जाने की बात करता है। अब तक इसका चेहरा एक ब्राह्मण नेता (पीके) और एक दलित नेता (मनोज भारती कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष) थे। अब आरसीपी सिंह के जुड़ने से इसमें कुर्मी प्रतिनिधित्व भी जुड़ गया है, जो कि बिहार की प्रभावशाली लेकिन सीमित संख्या (3%) वाली जातियों में शामिल है। इससे जन सुराज को सामाजिक संतुलन का दावा करने में मदद मिलेगी, साथ ही नीतीश कुमार के सजातीय वोटबैंक में सेंध लगाने का अवसर भी मिलेगा।
क्या बदलेगा सियासी समीकरण ?
आरसीपी सिंह (rcp singh) का नालंदा से आना, जो खुद नीतीश कुमार का गृह जिला है, कई राजनीतिक संकेत देता है। दोनों कुर्मी जाति से आते हैं और दोनों की राजनीतिक शुरुआत जेडीयू के मंच से हुई थी। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आरसीपी की पकड़ और संगठन कौशल जन सुराज को जमीनी स्तर पर मजबूती दे पाएगा या यह महज एक प्रतीकात्मक कदम भर रह जाएगा। जन सुराज को अब एक अनुभवी संगठनकर्ता मिल गया है, लेकिन चुनौती बड़ी है,नीतीश कुमार जैसे मंजे हुए नेता को उनके अपने गढ़ में घेरने की।
जन सुराज और आरसीपी सिंह का गठजोड़ बिहार की राजनीति में एक नई धुरी बनने की कोशिश है। हालांकि सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या यह गठजोड़ सिर्फ नीतीश-विरोध तक सीमित रहता है या इसके पास बिहार के लिए कोई ठोस विकल्प और जन समर्थन भी है। 2025 के चुनाव में इसकी परीक्षा होगी।