Nitish Kumar के गढ़ में विपक्ष की नई रणनीति…क्या है राहुल का बिहार प्लान ?

Rahul Gandhi Bihar visit : कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का बिहार दौरा एक बार फिर से चर्चा का विषय बन गया है। चुनावी साल की शुरुआत में ही बिहार में कांग्रेस की बढ़ती सक्रियता और राहुल गांधी के लगातार दौरे यह संकेत दे रहे हैं कि पार्टी इस बार राज्य में नई पारी खेलने को तैयार है। इस साल के पहले छह महीनों में यह राहुल गांधी का छठा दौरा है और यह दौरा कई मायनों में खास है।

Nitish Kumar के साइलेंट वोट बैंक पर Rahul Gandhi की चोट

इस दौरे का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि यह नालंदा जिले के राजगीर में हो रहा है, जो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) का गृह जिला है। नालंदा और गया जैसे इलाकों में राहुल गांधी की मौजूदगी और उनके कार्यक्रमों का फोकस साफ तौर पर नीतीश कुमार के कोर वोट बैंक को प्रभावित करने की कोशिश दिखाता है।राहुल गांधी के ‘महिला संवाद कार्यक्रम’ का मकसद इसी कोर वोट बैंक को साधना है। विपक्ष जानता है कि बिहार में बीजेपी के लिए महिलाओं का साइलेंट समर्थन जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही नीतीश कुमार के लिए भी। ऐसे में राहुल गांधी का महिला संवाद कार्यक्रम एनडीए को नए सिरे से चुनौती देने का प्रयास है।

बिहार में महिलाओं का बड़ा वोट बैंक लंबे समय से नीतीश कुमार का मजबूत सहारा रहा है। यह तथ्य चुनावी आंकड़ों से भी साबित होता है,2010 के विधानसभा चुनाव से लेकर 2020 तक, हर बार महिलाओं ने पुरुषों से ज़्यादा मतदान किया। 2010 में महिलाओं का मतदान प्रतिशत 54.5 रहा, जबकि पुरुषों का 53 फीसदी था। 2015 में यह अंतर और बढ़ गया और महिलाओं ने 60.4 फीसदी मतदान किया। 2020 के चुनाव में भी 59.7 फीसदी महिलाओं ने वोट डाला। इन आंकड़ों से साफ है कि महिला वोटर पर पकड़ नीतीश कुमार की राजनीति की रीढ़ रही है।

Rahul Gandhi की महादलित राजनीति वाली पिच

राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के इस दौरे की एक और अहम कड़ी है गया जिले के गहलौर गांव का दौरा। गहलौर वह जगह है, जहां से ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी की कहानी शुरू होती है। दशरथ मांझी के गांव जाकर राहुल गांधी ने न सिर्फ श्रद्धांजलि दी, बल्कि उनके परिवार से संवाद कर महादलित वोट बैंक पर अपनी नजरें गड़ा दीं। बिहार की राजनीति में महादलितों का वर्ग नीतीश कुमार के लिए हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। 2007 में नीतीश सरकार ने दलित जातियों में से पासवान को छोड़कर अन्य सभी को ‘महादलित’ का दर्जा दिया। यह कदम महादलित समुदाय को जेडीयू के पक्ष में लामबंद करने का ही था। लेकिन दशरथ मांझी के गांव जाकर राहुल गांधी ने यह संदेश दिया है कि कांग्रेस महादलितों की अनदेखी नहीं करेगी।

कांग्रेस की बदली हुई सक्रियता

बिहार में राहुल गांधी की यह सक्रियता केवल रैलियों या दौरे तक सीमित नहीं है। उन्होंने प्रदेश कांग्रेस में संगठनात्मक फेरबदल भी किए हैं। कृष्णा अल्लावरु को प्रदेश प्रभारी और राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर दलित नेतृत्व को अहमियत दी गई है। यह कदम दिखाता है कि कांग्रेस अब बिहार में सोशल इंजीनियरिंग के जरिए नीतीश कुमार और एनडीए के वोट बैंक को सीधे चुनौती देना चाहती है। राहुल गांधी का यह संदेश भी साफ है कि बिहार में सिर्फ जातीय समीकरणों की राजनीति नहीं चलेगी। सामाजिक न्याय, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे मुद्दे कांग्रेस के एजेंडे में सबसे ऊपर हैं। संविधान सुरक्षा सम्मेलन में राहुल गांधी ने जातीय जनगणना का मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी सवाल दागे। उनका कहना था कि जातीय जनगणना ही सत्ता के सही चेहरे को बेनकाब कर सकती है।

बिहार की चुनावी फिजा में बदलाव के संकेत

राहुल गांधी (Rahul Gandhi) का छठा बिहार दौरा साफ तौर पर दिखाता है कि कांग्रेस अब राज्य को लेकर कोई कोताही नहीं बरतना चाहती। नीतीश कुमार के गढ़ में जाकर राहुल गांधी ने यह जता दिया है कि विपक्ष की नजर अब सीधे उन वोटरों पर है, जो अभी तक जेडीयू और एनडीए का मजबूत आधार रहे हैं। महिला वोटर, महादलित और सामाजिक न्याय,यही तीन धुरी राहुल गांधी के बिहार मिशन का आधार बनती दिख रही हैं। आने वाले महीनों में बिहार की राजनीति और दिलचस्प होने वाली है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी की यह रणनीति वाकई नीतीश कुमार के किले को हिला पाएगी? बिहार की चुनावी फिजा में बदलाव के संकेत तो मिलने लगे हैं।

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