कॉन्टिजेंसी फंड से पेंशन…सरकारी कर्मियों को वेतन का इंतजार…आर्थिक हालात पर क्या छुपा रही सरकार ?

Bihar economic crisis : 10 जून को बिहार की सम्राट चौधरी सरकार ने आकस्मिक निधि (कॉन्टिजेंसी फंड) से करीब 3,662 करोड़ रुपये निकालकर राज्य के लगभग 94 लाख सामाजिक सुरक्षा पेंशन धारकों को मई, जून और जुलाई महीने की पेंशन का भुगतान कर दिया. कॉन्टिजेंसी फंड के इस इस्तेमाल को लेकर राजद नेता और विधानसभा में नेता विपक्ष तेजस्वी यादव ने राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर सरकार से सवाल किए और मौजूदा स्थिति को वित्तीय आपातकाल बाताया. हालांकि सरकार की ओर से इसे सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताया गया है. इसके बाद राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर जिस तरह का दावा कई मीडिया रिपोर्ट में किया जा रहा, वो हैरान करने वाला है.

पिछले चार महीने से वेतन का इंतजार कर रहे विश्वविद्यालय कर्मी

दरअसल, दावा किया जा रहा कि राज्य के करीब 50 हजार विश्वविद्यालय कर्मियों को पिछले चार महीने से वेतन और पेंशन का इंतजार करना पड़ रहा है. कई मीडिया रिपोर्ट में विश्वविद्यालय कर्मचारियों के संगठनों के हावाले से दावा किया जा रहा है कि लंबे समय से वेतन और पेंशन का भुगतान लंबित है. इसके अलावा संविदा कर्मियों और आउटसोर्सिंग एजेंसियों से जुड़े कर्मचारियों के वेतन भुगतान में भी देरी की शिकयतें सामने आई हैं. कई संगठनों ने दावा किया है कि उन्हें भी कई महीनों से भुगतान नहीं मिला है. जानकारों की मानें तो ऐसी स्थिति बिहार में लंबे समय बाद देखने को मिल रही है.

ठेकेदारों के भुगतान में देरी निर्माण क्षेत्र पर असर

राज्य में सरकारी काम करने वाले ठेकेदारों के भुगतान में देरी की खबरें भी लगातार सामने आती रही हैं. निर्माण क्षेत्र बिहार की आर्थिक गतिविधियों का एक बड़ा हिस्सा रहा है, लेकिन भुगतान में देरी और योजनाओं की गति धीमी होने से इस क्षेत्र पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है. विशेषज्ञों के अनुसार, निर्माण गतिविधियों में कमी का सीधा असर रोजगार और राज्य की आर्थिक वृद्धि पर पड़ सकता है.

वेतन-पेंशन खर्च में बड़ा उछाल

राज्य के बजट आंकड़ों को लेकर उठाए जा रहे सवालों के बीच सबसे बड़ी चिंता सरकार के बढ़ते राजस्व खर्च को लेकर है. दावा किया जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों में सरकारी कर्मचारियों की संख्या बढ़ने, वेतन वृद्धि और नई नियुक्तियों के कारण वेतन मद का खर्च काफी बढ़ गया है. आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में सरकार वेतन मद पर करीब 37,286 करोड़ रुपये का खर्च करती थी, 2026-27 में बढ़कर यह करीब 70,220 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. इस अवधि में पेंशन भुगतान और ब्याज की अदायगी का खर्च भी बढ़ा है. बिहार का 2026-27 का कुल बजट करीब 3.47 लाख करोड़ रुपये का है, जिसमें से बड़ी राशि वेतन, पेंशन और अन्य अनिवार्य खर्चों में जा रही है.

योजना खर्च की तुलना में बढ़ा गैर-योजना खर्च

आलोचकों का कहना है कि बिहार के बजट में पहले योजनाओं पर खर्च और वेतन-पेंशन जैसे मदों का खर्च लगभग बराबर हुआ करता था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है. वेतन-पेंशन और ब्याज जैसे अनिवार्य खर्चों का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है, जिससे विकास योजनाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है. इस साल बजट में जहां कुल वृद्धि करीब 30 हजार करोड़ रुपये की गई है. लेकिन वेतन-पेंशन मद में ही करीब 25 हजार करोड़ रुपये की बढ़ोतरी का दावा है. दूसरी योजना मद में बढ़ोतरी सीमित रही है.

चुनावी फैसलों और वित्तीय बोझ पर सवाल

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद रोजगार और सरकारी नौकरी बड़ा मुद्दा बना था. इसके बाद राज्य में बड़े पैमाने पर नियुक्तियां हुईं. सरकार ने संविदा कर्मियों को लेकर भी कई फैसले किए, जिसका असर सरकारी खर्च पर पड़ा. इसके अलावा 2025 के चुनावी साल में कई बड़ी योजनाओं और घोषणाओं ने भी वित्तीय दबाव बढ़ाया. इनमें विभिन्न विकास योजनाओं की स्वीकृति, महिला रोजगार योजना के तहत आर्थिक सहायता, सामाजिक सुरक्षा पेंशन में वृद्धि और बिजली सब्सिडी जैसे फैसले शामिल हैं.

विपक्ष का आरोप..सरकार को वित्तीय स्थिति स्वीकार करनी चाहिए

विपक्ष का कहना है कि सरकार को राज्य की आर्थिक स्थिति पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए. आरोप है कि चुनावी लाभ के लिए की गई घोषणाओं और बढ़ते खर्च ने खजाने पर दबाव बढ़ाया है, जिसका असर अब कर्मचारियों और विकास योजनाओं के भुगतान पर दिख रहा है. हालांकि सरकार का पक्ष है कि राज्य की वित्तीय व्यवस्था तय नियमों के अनुसार चल रही है और आकस्मिक निधि से भुगतान जैसी प्रक्रियाएं सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा हैं.

सोर्स : मीडिया रिपोर्ट