तमिलनाडु के बाद बिहार में बदलेगा विपक्षी समीकरण..! प्रशांत किशोर के साथ जाएगी कांग्रेस ?

Bihar politics : अब राजनीति चीज ही ऐसी हैं..कब कौन किसके साथ ? कहना मुश्किल हैं. ताजा उदाहरण है तमिलनाडु..जहां कांग्रेस और डीएमके का 11 साल पुराना रिश्ता टूट गया. तमिलनाडु की राजनीति में इस घटनाक्रम ने बिहार के विपक्षी गठबंधन को लेकर नई बहस छेड़ दी है और बिहार में भी यह सवाल तेज हो गया है कि क्या कांग्रेस आने वाले वर्षों में राजद का साथ छोड़ सकती है. दरअसल 2025 बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों ने विपक्षी खेमे को एक बार फिर झटका दिया है. चुनाव में एक तरफ जहां आरजेडी की सीटें सीमित रहीं वहीं कांग्रेस का प्रदर्शन भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा. ऐसे में महागठबंधन की उपयोगिता पर सवाल उठने लगे हैं.

कांग्रेस का प्रदर्शन क्यों बना चिंता का विषय?

बिहार में कांग्रेस लगातार आरजेडी के साथ चुनाव लड़ती रही है, लेकिन उसका वोट प्रतिशत लगभग स्थिर बना हुआ है. 2010 में अकेले चुनाव लड़ने पर कांग्रेस को लगभग 8.4% वोट मिले. 2015 में महागठबंधन के साथ यह आंकड़ा 6.8% रहा. 2020 में कांग्रेस 9.6% तक पहुंची और 2025 में फिर यह घटकर लगभग 8.9% पर आ गया. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि गठबंधन में रहने के बावजूद कांग्रेस को संगठनात्मक या जनाधार स्तर पर कोई बड़ा फायदा नहीं मिला. यही कारण है कि अब पार्टी के भीतर नए विकल्पों पर चर्चा शुरू हो चुकी है.

क्या आरजेडी के साथ रहने से कांग्रेस को नुकसान?

बिहार की राजनीति लंबे समय से सामाजिक समीकरणों पर आधारित रही है. आरजेडी की राजनीति मुख्यतः MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण के इर्द-गिर्द केंद्रित मानी जाती है. आलोचकों का तर्क है कि कांग्रेस इसी छवि के साथ जुड़कर अपने व्यापक सामाजिक विस्तार की संभावना खो रही है. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का यह भी मानना है कि Rahul Gandhi की बिहार यात्राओं और जनसंपर्क अभियानों का अपेक्षित असर नहीं दिखा. कई क्षेत्रों में कांग्रेस को नुकसान भी उठाना पड़ा.

क्या कांग्रेस और जन सुराज साथ आ सकते हैं?

अब चर्चा का केंद्र Prashant Kishor और उनकी पार्टी Jan Suraaj हैं. राजनीतिक गलियारों में यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि कांग्रेस भविष्य में जन सुराज के साथ गठबंधन कर सकती है. इसके पीछे जो तर्क दिए जा रहे उसमें,राहुल गांधी और प्रशांत किशोर के बीच बढ़ती राजनीतिक नजदीकियां, कांग्रेस की बिहार में नए सामाजिक आधार की तलाश, प्रशांत किशोर की जरूरत कि किसी स्थापित पार्टी का वोट बैंक उनके साथ जुड़े और आरजेडी और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर लगातार तनाव आदि शामिल हैं. विश्लेषकों का मानना है कि अगर कांग्रेस और जन सुराज साथ आते हैं तो बिहार में विपक्ष की राजनीति का नया ध्रुव बन सकता है.

तेजस्वी यादव के सामने चुनौती

Tejashwi Yadav के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सहयोगी दलों के साथ रहने के बावजूद विपक्ष का प्रदर्शन लगातार कमजोर हुआ है. 2020 चुनाव के बाद तेजस्वी यादव ने खुद कहा था कि अगर कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करती तो सरकार बन सकती थी. 2025 तक आते-आते सीट बंटवारे को लेकर विवाद और बढ़ गया.ऐसे में अगर कांग्रेस अलग रास्ता चुनती है तो आरजेडी के लिए यह बड़ा राजनीतिक झटका माना जाएगा.

नीतीश कुमार के बाद बदलेंगे समीकरण?

राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि आने वाले चुनावों में Nitish Kumar की सक्रिय भूमिका पहले जैसी नहीं रह सकती. यदि बिहार की राजनीति नेतृत्व परिवर्तन के दौर में जाती है, तो गठबंधन की राजनीति भी नए रूप में सामने आ सकती है. यही वजह है कि 2030 के चुनाव को लेकर अभी से नए समीकरणों की चर्चा शुरू हो चुकी है.

क्या कांग्रेस को आरजेडी का साथ छोड़ देना चाहिए?

यह सवाल अब बिहार की राजनीति का बड़ा विषय बन चुका है. कांग्रेस के सामने दो रास्ते हैं, आरजेडी के साथ रहकर पारंपरिक गठबंधन को जारी रखना या नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बनाकर स्वतंत्र पहचान मजबूत करना. देखना होगा की कांग्रेस किस रास्ते को चुनती हैं. हालांकि अभी तक कांग्रेस या जन सुराज की ओर से किसी औपचारिक गठबंधन का संकेत नहीं दिया गया है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस संभावना पर गंभीर चर्चा जरूर शुरू हो चुकी है. अगर आने वाले समय में कांग्रेस वास्तव में नई रणनीति अपनाती है, तो बिहार की राजनीति में विपक्ष का पूरा चेहरा बदल सकता है.

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