India Energy Crisis : देश में एलपीजी (रसोई गैस) की किल्लत को लेकर हालात लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं. कई राज्यों से गैस सिलेंडर के लिए लंबी कतारों और लोगों की परेशानी की खबरें सामने आ रही हैं. इसी बीच तेल आपूर्ति को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं, हालांकि सरकार का दावा है कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है.
तेल भंडारण और आपूर्ति पर सरकार का दावा
सरकार के अनुसार भारत के पास कुल मिलाकर लगभग 74 दिनों की तेल भंडारण क्षमता है. इसमें तेल कंपनियों के पास करीब 64.5 दिन का स्टॉक और स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व में लगभग 9.5 दिन का भंडारण शामिल है. हालांकि 23 मार्च को राज्यसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, यह पूरी क्षमता भरी हुई नहीं है. देश के कच्चे तेल के भंडार का केवल लगभग 64% हिस्सा ही भरा हुआ है. भारत के स्ट्रेटेजिक रिजर्व की कुल क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है, जिसमें से करीब 3.37 मिलियन मीट्रिक टन तेल ही मौजूद है. ताजा सरकारी बयानों की मानें तो सभी रिफाइनरी उच्च क्षमता पर काम कर रही हैं, कच्चे तेल का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है तथा पेट्रोल और डीजल का स्टॉक भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद है. सरकार ने यह भी दावा किया है कि अगले 60 दिनों के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति का इंतजाम कर लिया गया है.
क्या युद्ध से बढ़ सकता है संकट?
मध्य पूर्व में जारी तनाव और संभावित लंबे युद्ध को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं. भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिसमें एक बड़ा भाग पश्चिम एशिया से आता है. यदि क्षेत्र में संघर्ष लंबा खिंचता है तो तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है और वैकल्पिक स्रोत (जैसे रूस और अमेरिका) से आयात महंगा पड़ सकता है. वहीं वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं. हालात को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कमी से ज्यादा बड़ा असर कीमतों पर पड़ेगा. सरकार ने हाल ही में एक्साइज ड्यूटी घटाकर कुछ राहत देने की कोशिश की है, लेकिन हालात नहीं बदले तो आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने की संभावना जताई जा रही है.
एलपीजी संकट का आम जनता पर सीधा असर
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है और अपनी जरूरत का लगभग 60% गैस आयात करता है. 2025 में भारत ने करीब 22 मिलियन मीट्रिक टन एलपीजी आयात की, जिसमें से अधिकांश मध्य पूर्व से आया. रिपोर्ट्स के अनुसार लगभग 90% एलपीजी आयात एक अहम समुद्री मार्ग (स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज) से होता है. मध्य पूर्व में जारी तनाव के कारण इस मार्ग पर असर पड़ने से भारत की कुल गैस सप्लाई का करीब 54% प्रभावित हुआ है.जिसका नतीजा हुआ है कि मार्च के दूसरे हफ्ते में देश के कई हिस्सों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी लाइनें देखी गईं, लोगों को सिलेंडर के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा और कुछ जगहों पर लोग रातभर एजेंसी के बाहर रुकने को मजबूर हुए. हालांकि सरकार ने स्थिति संभालने के लिए कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई घटाई और घरेलू सिलेंडरों की आपूर्ति बढ़ाई लेकिन तस्वीरें नहीं बदली और अब भी कुछ इलाकों से संकट के संकेत मिल रहे हैं.
रोजगार पर असर
एलपीजी की कमी का असर केवल घरों तक सीमित नहीं है. छोटे व्यवसाय और कामगार भी प्रभावित हो रहे हैं. गैस न मिलने के कारण कामकाज ठप हो रहा है और कई जगहों से मजदूरों के पलायन की खबरें आ रही हैं. फिलहाल सरकार तेल को लेकर स्थिति को नियंत्रित बता रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय हालात को देखते हुए भविष्य में चुनौतियां बढ़ सकती हैं. वहीं एलपीजी संकट ने आम जनता और छोटे कारोबारियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार सप्लाई चेन को कितनी जल्दी स्थिर कर पाती है और बढ़ती कीमतों से लोगों को कितनी राहत मिलती है.