Crude oil prices : मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बावजूद भारतीय शेयर बाजार में 10 मार्च को मजबूती देखने को मिली. वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच निवेशकों की निगाहें कच्चे तेल की कीमतों, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोस में हालात और अमेरिका-ईरान-इजराइल के बीच चल रहे तनाव पर टिकी हुई हैं.
शेयर बाजार में गिरावट के बाद रिकवरी
9 मार्च को कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के कारण भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट आई थी. लेकिन अगले ही दिन बाजार ने कुछ हद तक रिकवरी दिखाई. BSE Sensex 78,375 पर खुलकर 78,205 पर बंद हुआ, जो पिछले दिन की तुलना में लगभग 0.8% की बढ़त है. वहीं Nifty 50 24,280 पर खुला और 24,261 पर बंद हुआ, यानी करीब 0.9% की बढ़त. इंडेक्स के 16 प्रमुख सेक्टरों में से 14 सेक्टर हरे निशान में बंद हुए. हालांकि आईटी और ऑयल-गैस सेक्टर में दबाव बना रहा. मिड और स्मॉल कैप शेयरों में भी तेजी रही, जहां निफ्टी मिडकैप 100 और निफ्टी स्मॉलकैप 100 करीब 1.5% तक चढ़े.
क्रूड ऑयल में भारी उतार-चढ़ाव
वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में असामान्य उतार-चढ़ाव देखा गया. Brent Crude की कीमत एक समय 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी. बाद में यह गिरकर लगभग 86–94 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई. इस उतार-चढ़ाव की मुख्य वजह मिडिल ईस्ट में युद्ध को लेकर अनिश्चितता और अमेरिकी राजनीतिक बयान रहे. अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया कि ईरान के साथ चल रहा सैन्य अभियान अपने अंतिम चरण में है और युद्ध जल्द खत्म हो सकता है. इस बयान के बाद बाजार में मौजूद वार प्रीमियम घटा और तेल की कीमतें नीचे आईं.हालांकि जमीन पर हालात अभी भी तनावपूर्ण बने हुए हैं और हमलों की खबरें जारी हैं.
दुनिया की ऊर्जा सप्लाई का अहम रास्ता
मौजूदा संकट का सबसे बड़ा केंद्र Strait of Hormuz है. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है. हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल इस रास्ते से गुजरता है. यह दुनिया की कुल तेल खपत का लगभग 20% है. अगर इस रास्ते में बाधा आती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा संकट पैदा हो सकता है. ईरान के सैन्य संगठन Islamic Revolutionary Guard Corps ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका और इजराइल के हमले जारी रहे तो मिडिल ईस्ट से तेल की सप्लाई रोक दी जा सकती है. इस बयान ने वैश्विक बाजार में चिंता बढ़ा दी है. विशेषज्ञों के मुताबिक इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही कम होने की एक बड़ी वजह इंश्योरेंस लागत है. युद्ध के खतरे के कारण शिपिंग इंश्योरेंस प्रीमियम कई गुना बढ़ गया है. कई कंपनियां जोखिम के कारण जहाज भेजने से बच रही हैं. भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में बदलाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.
पेट्रोल-डीजल हो सकता है महंगा
आयात बिल बढ़ सकता है , हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का सालाना आयात बिल लगभग ₹3000 करोड़ बढ़ सकता है. करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ सकता है तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट, एयरलाइंस, मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ती है अनुमान है कि अगर कच्चे तेल का औसत मूल्य 10 डॉलर बढ़ता है, तो भारत में महंगाई 2–3% तक बढ़ सकती है. तेल की कीमतों में तेज उछाल को देखते हुए G7 देशों ने संकेत दिया है कि जरूरत पड़ने पर वे अपने स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व से तेल बाजार में जारी कर सकते हैं. इससे कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है. मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है. फिलहाल राजनीतिक बयानों से बाजार को राहत मिल रही है, लेकिन यदि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोस में सप्लाई बाधित होती है तो इसका असर तेल की कीमतों, वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत की महंगाई पर गंभीर रूप से पड़ सकता है.