Bihar politics : लगभग दो दशक तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार की नजर अब दिल्ली की राजनीति पर है. जदयू नेता और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष Nitish Kumar ने राज्यसभा के लिए नामांकन भी कराया है. जिसके बाद से बिहार की राजनीति में उथल पुथल मचा हुआ है. पक्ष और विपक्ष के कई नेता नीतीश कुमार के फैसले को लेकर आरोप प्रत्यारोप करते हुए तमाम तरह के सवाल उठा रहे हैं. हालांकि मीडिया रिपोर्ट की मानें तो नीतीश कुमार का यह फैसला अचानक लिया गया फैसला नहीं है बल्कि उसके पीछे एक लंबी राजनीतिक प्रक्रिया और रणनीतिक बातचीत बताई जा रही है. मीडिया सूत्रों के अनुसार यह पूरा घटनाक्रम फरवरी के मध्य से धीरे-धीरे आकार लेने लगा था.
बताया जाता है कि मिड-फरवरी के आसपास पहली बार सीएम आवास को राजनीतिक संदेश भेजा गया, लेकिन उस समय बिहार के मुख्यमंत्री रहे Nitish Kumar की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. इस दौरान अलग-अलग समय पर कई लोग उनसे मिलने भी आते रहे और राजनीतिक हलकों में लगातार बातचीत जारी रही.
राज्यसभा सीट की वैकेंसी बनी राजनीतिक अवसर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में Rajya Sabha की सीटों की वैकेंसी भी एक अहम कारण थी. राज्यसभा एक स्थायी सदन है जो कभी भंग नहीं होता, लेकिन हर दो साल में इसकी एक-तिहाई सीटों पर चुनाव होता है. बिहार से भी इस बार लगभग पाँच सीटें खाली होने वाली है. यहीं से भारतीय जनता पार्टी को एक राजनीतिक अवसर दिखा. हालांकि इसे अचानक लागू करने के बजाय धीरे-धीरे राजनीतिक तरीके से आगे बढ़ाया गया.
नेताओं के बीच लगातार संपर्क
मीडिया सूत्रों के हावाले से दावा किया जाता है कि इस दौरान जेडीयू के वरिष्ठ नेता Lalan Singh समेत कई पुराने सहयोगी लगातार संपर्क में रहे. 26 फरवरी के आसपास उनकी मुलाकात भी हुई थी, जिसके बाद वे दिल्ली चले गए लेकिन संवाद बना रहा. मार्च के शुरुआती दिनों में मुख्यमंत्री आवास में भी कई तरह की राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गईं. इसी दौरान संभावित नामों को लेकर चर्चा तेज हो गई.
संभावित नामों की चर्चा और रणनीतिक अटकलें
राजनीतिक गलियारों में शुरुआत में Manish Verma के नाम की चर्चा होने लगी थी. हालांकि कुछ नेताओं ने स्पष्ट जवाब देने से बचते हुए सिर्फ इतना कहा कि देखिए क्या होता है, जिससे संकेत मिला कि कोई अन्य विकल्प भी संभव हो सकता है. इसके बाद चर्चा का रुख अचानक बदल गया और मुख्यमंत्री के बेटे Nishant Kumar के राजनीति में आने की अटकलें तेज हो गईं. बताया जाता है कि यह चर्चा आंशिक रूप से एक रणनीतिक कदम भी हो सकती थी, जिससे अन्य नामों को पीछे किया जा सके. सूत्रों के मुताबिक निशांत कुमार राष्ट्रीय राजनीति में आने के इच्छुक नहीं थे. उनका रुझान राज्य की राजनीति की ओर बताया जाता है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पिता-पुत्र के बीच एक स्वाभाविक व्यक्तिगत समीकरण भी था, जिसके कारण वे फिलहाल एक साथ ही रहना चाहते थे.
स्वास्थ्य और राजनीतिक सक्रियता पर चर्चा
इसी दौरान मुख्यमंत्री को यह समझाया गया कि सक्रिय राजनीति से हटने की स्थिति में राज्यसभा सदस्यता एक सम्मानजनक विकल्प हो सकता है. बताया जाता है कि उन्हें यह भी याद दिलाया गया कि उन्होंने हमेशा परिवारवाद से दूरी बनाए रखने की बात कही है, इसलिए यदि वे खुद राजनीति से अलग होने के बाद बेटे की एंट्री होती है तो उस पर वंशवाद का आरोप भी कम लगेगा. राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि पिछले कुछ वर्षों में मुख्यमंत्री की सक्रियता पहले जैसी नहीं रही. विधानसभा कवर करने वाले कई पत्रकारों का कहना है कि पहले जहां उनसे अक्सर मुलाकात हो जाती थी, वहीं पिछले चार-पाँच वर्षों से उनसे मिलना काफी सीमित हो गया है. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सरकार का संचालन धीरे-धीरे एक तरह के प्रशासनिक सिस्टम के जरिए चलने लगा था, जिसमें नौकरशाही की भूमिका बढ़ गई थी.
बीजेपी की रणनीति और विपक्ष की निष्क्रियता पर सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि Bharatiya Janata Party ने परिस्थितियों का आकलन करते हुए सही समय पर अपनी रणनीति लागू की. उनका मानना है कि एक कमजोर पड़ते राजनीतिक नेतृत्व और बदलते समीकरणों के बीच पार्टी ने यह आकलन किया कि अब आगे की राजनीति के लिए नए समीकरण बनाए जा सकते हैं. इस पूरे घटनाक्रम के दौरान विपक्ष की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं. कुछ नेताओं का मानना है कि विपक्ष के पास वैकल्पिक राजनीतिक प्रस्ताव देने का अवसर था, लेकिन वे उसे भुना नहीं सके. राजनीतिक टिप्पणीकारों का कहना है कि यदि विपक्ष सक्रियता दिखाता तो परिस्थितियां अलग भी हो सकती थीं.